Jo Ja Raha Hai Waqt | Poetry By Ankit Paurush

In this poetry the author tries to relate the present condition as penance and the coming future will be as glowing sun.

जो जा रहा है वक्त, वो मेरी तपस्या है,
जब आएगा वक्त, वो मेरा दौर होगा,
सोने की तरह आग में तप रहा हूं,
जब उगूंगा तो सूरज के तरह चमक होगी,
जो जा रहा है वक्त, वो मेरी तपस्या है।

स्वाभिमान का सूरज हूं मैं,
अभिमान की न कोई झलक होगी,
थोड़ा हार गया समय के खेल में,
सात घोड़ों के रथ में, मेरी विजय होगी।
जो जा रहा है वक्त, वो मेरी तपस्या है,
जब आएगा वक्त, वो मेरा दौर होगा।

सूरज का काम है उगना,
मेरे अंदर भी एक सूरज है,
जब आएगा मेरा दौर,
घर घर के आंगन में मेरी चमक होगी।
जो जा रहा है वक्त, वो मेरी तपस्या है,
जब आएगा वक्त, वो मेरा दौर होगा।

जो साथ दे रहा है मेरा,
हृदय के आंगन में, उसकी हमेशा जगह होगी,
सूरज हूं, बिलकुल उगुंगा,
थोड़ा तप रहा हूं,
जब उगूंगा तो दूर दूर तक मेरी चमक होगी।

अंकित पौरुष

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By Ankit Paurush

अंकित पौरुष अभी बंगलोर स्थित एक निजी सॉफ्टवेर फर्म मे कार्यरत है , साथ ही अंकित नुक्कड़ नाटक, ड्रामा, कुकिंग और लेखन का सौख रखते हैं , अंकित अपने विचार से समाज मे एक सकारात्मक बदलाव के लिए अक्सर अपने YouTube वीडियो , इंस्टाग्राम हैंडल और सभी सोसल मीडिया के हैंडल पर काफी एक्टिव रहते हैं और जब भी समय मिलता है इनके विचार पंख लगाकर उड़ने लगते हैं

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