मणिपुर - जल्दबाजी में दिए बयानों की नहीं ठोस फैसलों की जरूरत



मणिपुर में जारी संघर्ष और हिंसा ने एक बात तो स्पष्ट कर दी है – क़ानून जो कभी पुराने ब्रिटिश दौर में बने थे वो आधुनिक भारत के लिए प्रयाप्त नहीं हैं। ऐसे किसी कानून में बदलाव होने की संभावना भर से क्या होता है, ये हम कृषि कानूनों में बदलावों की सरकारी कोशिशों में देख चुके हैं। अगर बदलाव नहीं किये गए तो किसान अपनी फसल सड़कों पर फेंकने को मजबूर होता है, ये हम लोग हर साल देखते हैं। ऐसे में बदलाव किये जाएँ या यथास्थिति बनाये रखकर कबूतर की तरह बिल्ली की तरफ से आँखें मूँद ली जाएँ, ये एक बड़ा सवाल है।

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By anandkumar

आनंद ने कंप्यूटर साइंस में डिग्री हासिल की है और मास्टर स्तर पर मार्केटिंग और मीडिया मैनेजमेंट की पढ़ाई की है। उन्होंने बाजार और सामाजिक अनुसंधान में एक दशक से अधिक समय तक काम किया। दोनों काम के दायित्वों के कारण और व्यक्तिगत रूचि के लिए भी, उन्होंने पूरे भारत में यात्राएं की हैं। वर्तमान में, वह भारत के 500+ में घूमने, अथवा काम के सिलसिले में जा चुके हैं। पिछले कुछ वर्षों से, वह पटना, बिहार में स्थित है, और इन दिनों संस्कृत विषय से स्नातक (शास्त्री) की पढ़ाई पूरी कर रहें है। एक सामग्री लेखक के रूप में, उनके पास OpIndia, IChowk, और कई अन्य वेबसाइटों और ब्लॉगों पर कई लेख हैं। भगवद् गीता पर उनकी पहली पुस्तक "गीतायन" अमेज़न पर बेस्ट सेलर रह चुकी है।

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