एक प्रेस वार्ता में कांग्रेसी नेता जयराम रमेश कांग्रेस का तथाकथित “न्याय पत्र” यानि अपना चुनावी घोषणापत्र लहराकर कहते हुए दिखाई दिए कि हमारे बारे में झूठ फैलाया जा रहा है जी! हमने तो अपने घोषणा कहीं लिखा ही नहीं कि हम ऐसा कोई पुनः वितरण करेंगे जी! इससे ऐसा लगा कि या तो उन्होंने स्वयं ही अपना घोषणापत्र नहीं पढ़ा, या फिर कांग्रेसी परंपरा का निर्वाह करते हुए पूरी बेशर्मी से झूठ बोलने पर अमादा हैं। कांग्रेस का मैनिफेस्टो अगर पढ़कर देखिएगा तो हर हैडिंग में न्याय शब्द जुड़ा मिलेगा। राज्य न्याय है, रक्षा न्याय है, पर्यावरण न्याय भी है और ऐसे ही एक शीर्षक “हिस्सेदारी न्याय” है। जो अक्सर जुमलों में, सभाओं-भाषणों में सुनाई देता है “जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी”, उसी जुमले से शायद इसे उठा लिया गया है। उठाया हुआ इसलिए लगता है क्योंकि “हिस्सेदारी” केवल अधिकारों में बताई जाती है, कर्तव्यों में हिस्सेदारी की कभी कोई बात नहीं होती।

 

इस “हिस्सेदारी न्याय” में पृष्ठ संख्या छः पर आपको मिलेगा सातवाँ बिंदु, जो कहता है “कांग्रेस भूमिहीनों को जमीन वितरित करेगी”। मार्क्स के सिद्धांतों से उत्पादन के स्रोतों को मान लें तो उत्पादन के लिए तीन स्रोत चाहिए – भूमि संसाधन, आर्थिक संसाधन यानि धन और मानव संसाधन यानि मजदूर-कामगार। उत्पादन के स्रोत सिमित होते हैं ऐसा भी माना जाता है। औद्योगिक या कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में ये कुछ हद तक सही होता, आज के विश्व में ये अनुपयोगी हो गया सिद्धांत है, ऐसी बहसें भी इसपर निकलती हैं, लेकिन अभी उन्हें छोड़कर हम केवल भूमि के मुद्दे पर रहते हैं। चावल-गेहूं या दूसरे अनाज अधिक खाद-पानी देकर, बेहतर कृषि तकनीक अपनाकर अधिक मात्रा में उपजाए जा सकते हैं। भूमि, जल इत्यादि के साथ वैसा नहीं है। भूमि जितनी है, उतनी ही रहेगी। ज्यादा से ज्यादा पड़ोसी देशों की जमीनें चीन की तरह कब्जाकर अपने पास भूमि बढ़ाई जा सकती है, लेकिन भारत तो वैसा करेगा नहीं!

 

तो दूसरा तरीका क्या होगा भूमिहीनों को भूमि देने का? एक तो ये हो सकता है कि सेना और रेलवे जैसे सरकारी संगठनों के पास जो भूमि है, उसे लेकर भूमिहीनों में बांटा जाये। ये हो नहीं सकता क्योंकि सेना के नियंत्रण में अधिकांश सीमावर्ती क्षेत्रों में भूमि होगी और वो उससे लेकर, वहां लोगों को बसाना राष्ट्र की सुरक्षा से सीधा खिलवाड़ होगा। निजी कंपनियों को एअरपोर्ट चलाने देने पर ही कांग्रेस लगातार एअरपोर्ट बेच दिया, देश बेच दिया का शोर करती रही है, इसलिए स्टेशन इत्यादि जो रेलवे के हैं उन्हें बेचने का तो नहीं सोच रही होगी? हाल ही में उत्तराखंड में ऐसे ही रेलवे की भूमि पर कब्जे का एक मामला हमलोग समाचारों में देख चुके हैं। तीसरा जो संगठन, सबसे अधिक भूमि रखने के लिए जाना जाता है, वो वक्फ बोर्ड है। जब 2014 में कांग्रेस की सरकार जाने वाली थी, उन अंतिम दिनों में कांग्रेस ने दिल्ली में सैकड़ों संपत्तियां वक्फ बोर्ड को दी थी। सरकार ने हाल ही में उन्हें वापस लिया तो उसपर हुआ हंगामा भी देश समाचारों में देख चुका है। साफ ही है कि कांग्रेस वक्फ बोर्ड से भी कोई जमीन नहीं लेने वाली।

 

अब सवाल वापस घूमकर वहीं आ जाता है जहाँ से शुरू हुआ था। भूमि और तो पैदा नहीं की जा सकती, सरकारी भूमि अगर वर्षों से थी ही तो नेहरु-इंदिरा आदि की कांग्रेसी सरकारों ने भूमिहीनों को दे दी होती। वक्फ जैसे संगठनों से कांग्रेस वापस नहीं लेगी। फिर जमीन भूमिहीनों को बांटने के लिए आयेगी कहाँ से? अंग्रेजी में जो रीडिंग बिटवीन द लाइन्स का जुमला होता है, या हिंदी में कहते हैं कि थोड़ा लिखा ज्यादा समझना, वो यहीं काम आता है। स्पष्ट है कि आम नागरिकों के पास जो जमीनें हैं, किसानों के पास जो भूमि है, उसी में से लेकर भूमिहीनों को दिया जायेगा। अगर नहीं दिया जायेगा तो कांग्रेसी ही बता दें कि वो जमीन कहाँ से आएगी?

 

इसी पन्ने पर जो दूसरा बिन्दु है, उसमें आरक्षण पर से 50% कैप हटाने की बात की गयी है। आरक्षण के जरिये जो संसाधन पिछड़े वर्गों को मिलते हैं, उनका कांग्रेस क्या करती है, ये तो उनके कर्णाटक के अभी हाल के फैसले से स्पष्ट ही है। जो आरक्षण केवल हिन्दुओं के ओबीसी वर्ग के लिए था, क्योंकि अन्य मजहब-रिलिजन तो जातियों में भेदभाव करते नहीं, उसमें मुहम्मडेन समुदाय की सभी जातियों को अब कर्णाटक में आरक्षण दिया जायेगा। पहले भी मुहम्मडेन आबादी का पचास फीसदी से अधिक हिस्सा, हर राज्य में, ओबीसी आरक्षण का लाभ लेता है। अगर आरक्षण पहले ही ओबीसी हिन्दुओं के लिए 27% के लगभग है, और उसमें सभी मुहम्मडेन ज़ातों को जगह दे दी गयी तो उतने ही संसाधनों में हिस्सेदारी तो अधिक लोगों की हो गयी। प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष रूप से ये पुनःवितरण ही तो हुआ न?

 

कुल मिलाकर कांग्रेस और उसके मुखपत्र जो कह रहे हैं कि हमारे घोषणापत्र में तो संपत्ति के पुनः वितरण जैसा कुछ नहीं लिखा, वो शब्दों की बाजीगरी से अधिक कुछ भी नहीं। अब देखना बस ये है कि जनता ने ठीक से घोषणापत्र पढ़-समझ कर मतदान का फैसला किया है, या ऐसे ही।

By anandkumar

आनंद ने कंप्यूटर साइंस में डिग्री हासिल की है और मास्टर स्तर पर मार्केटिंग और मीडिया मैनेजमेंट की पढ़ाई की है। उन्होंने बाजार और सामाजिक अनुसंधान में एक दशक से अधिक समय तक काम किया। दोनों काम के दायित्वों के कारण और व्यक्तिगत रूचि के लिए भी, उन्होंने पूरे भारत में यात्राएं की हैं। वर्तमान में, वह भारत के 500+ में घूमने, अथवा काम के सिलसिले में जा चुके हैं। पिछले कुछ वर्षों से, वह पटना, बिहार में स्थित है, और इन दिनों संस्कृत विषय से स्नातक (शास्त्री) की पढ़ाई पूरी कर रहें है। एक सामग्री लेखक के रूप में, उनके पास OpIndia, IChowk, और कई अन्य वेबसाइटों और ब्लॉगों पर कई लेख हैं। भगवद् गीता पर उनकी पहली पुस्तक "गीतायन" अमेज़न पर बेस्ट सेलर रह चुकी है।

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