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आज दिनांक 18 मई 2022 को बिहार संग्रहालय में विश्व विरासत दिवस के अवसर पर बिहार के पारंपरिक कलाओं के प्रशिक्षण के लिए एक कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यशाला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, पटना मंडल, बिहार पुराविद परिषद्, फेसेस पटना और बिहार म्यूजियम के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया।
इस कार्यशाला में पटना विमेंस कॉलेज, नोट्रे डेम अकैडमी, इंटरनेशनल स्कूल, रेडियंट इंटरनेशनल स्कूल, केंद्रीय विद्यालय नंबर 2, बेली रोड, आर्मी पब्लिक स्कूल दानापुर और उपेन्द्र महारथी शिल्प अनुसन्धान संस्थान से कुल 70 छात्रों ने मधुबनी पेंटिंग, मृण्मूर्ति कला, पटना कलम, मञ्जूषा कला और टिकुली कला का प्रशिक्षण प्राप्त किया। युवा कलाकार एवं प्रशिक्षक श्री सुमित कुमार (आराधना कला केंद्र, सीवान), श्री अभिषेक कुमार (बगईचा कला केंद्र), श्री शशि कुमार (आरा, भोजपुर) एवं सुश्री रूचि कुमारी ने छात्रों को उनके पसंद की कलाओं का प्रशिक्षण दिया। सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान किया गया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि बिहार संग्रहालय के महानिदेशक एवं मुख्यमंत्री के सलाहकार श्री अंजनीकुमार सिंह (भा०प्र०से०) एवं विशिष्ठ सम्मानित अथिति के रूप में श्री राजेंद्र प्रसाद मंजुल ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण पटना मंडल के सहायक अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. प्रसन्ना दीक्षित, फेसेस की महासचिव श्रीमती सुनिता भारती, बिहार पुराविद परिषद् के महासचिव डॉ. उमेश चन्द्र द्विवेदी ने अतिथियों का स्वागत किया। धन्यवाद ज्ञापन फेसेस की महासचिव सुनिता भारती ने किया तथा सञ्चालन फेसेस के संस्कृति सचिव शुभम सिंह ने किया।
अपने उद्घाटन भाषण में श्री अंजनीकुमार सिंह  ने आयोजकों को बधाई देते हुए कहा कि बिहार के पारंपरिक कला को सीखने और समझने के लिए इतनी संख्या में छात्रों का उत्साहपूर्ण भागीदारी देख कर मैं अभिभूत हूँ। यह इस बात का प्रमाण है कि दुनियां चाहे जितनी बदल गई हो, बिहार के युवाओं की कला-प्रियता कम नहीं हुई है। यह देख कर कि हमारे युवाओं के हाथों में हमारी कलात्मक  विरासत सुरक्षित है, मुझे काफी संतोष होता है। उन्होंने कहा कि बिहार की पारंपरिक कलाएं केवल शौकिया ही नहीं बल्कि रोजगार का भी बहुत बड़ा साधन है। हमने सरकार की ओर से एक प्रशिक्षण संस्थान भी खोला है जिसमें प्रशिक्षण देने के लिए प्रोफेसर की नियुक्त डिग्री के आधार पर नहें बल्कि काम के आधार पर किया गया है। उन्होंने बिहार म्यूजियम में बच्चों के लिए बनाये गए गैलरी का विस्तृत वर्णन भी किया।
विशिष्ट अतिथि के आसन से बोलते हुए, बिहार के मूर्धन्य कलाकार और रेलवे स्टेशनों को मधुबनी कला से सजाने वाले भारत के प्रथम कलाकार श्री राजेन्द्र प्रसाद मंजुल ने कहा कि बिहार की धरती परंपरागत कलाओं की विविध रंगों से सजी एक बड़े कैनवास की तरह है, जिसे समय का धूल कभी धूमिल नहीं कर सकता। युवा पीढ़ी में इन कलाओं के प्रति अनुराग पैदा करने के इस पावन कार्य की मैं भूरी भूरी प्रशंसा करता हूँ और आयोजकों को बधाई देता हूँ।
बिहार पुराविद परिषद् के महासचिव डॉ. उमेश चन्द्र द्विवेदी ने कहा कि कि बिहार की भूमि कला-प्रसूता है। मानव सभ्यता के विकास की उषा काल में ही यहाँ कलाओं का उदय हुआ जिसके पुरातात्विक प्रमाण शैल और गुफा चित्रों के रूप में आज भी हमारे सामने हैं। बिहार हमारी पारंपरिक कलाएं आज वैश्विक बाजार के युग में अपनी विशिष्ट पहचान के साथ सम्मानित हो रही है। बिहार की कलाएं मानव जीवन की गहराइयों से उद्भूत हैं, अतः शास्वत हैं। इन कलाओं के प्रति हमारा प्रेम ही इनके संरक्षण और विकास की गारंटी है। अतः आवश्यक है कि हम इन्हें अपने नयी पीढ़ी सौंपने का अथक प्रयास करें।
इस अवसर पर बिहार संग्रहालय के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. सुनील कुमार झा, डॉ. रणवीर सिंह राजपूत, डॉ. मौमिता घोष, डॉ. विशी उपाध्याय, डॉ. नन्द कुमार इत्यादि उपस्थित थे।

By anandkumar

आनंद ने कंप्यूटर साइंस में डिग्री हासिल की है और मास्टर स्तर पर मार्केटिंग और मीडिया मैनेजमेंट की पढ़ाई की है। उन्होंने बाजार और सामाजिक अनुसंधान में एक दशक से अधिक समय तक काम किया। दोनों काम के दायित्वों के कारण और व्यक्तिगत हित के रूप में उन्होंने पूरे भारत में यात्रा की। वर्तमान में, वह भारत के 500+ जिलों में अपना टैली रखता है। पिछले कुछ वर्षों से, वह पटना, बिहार में स्थित है, और इन दिनों संस्कृत में स्नातक की पढ़ाई पूरी कर रहें है। एक सामग्री लेखक के रूप में, उनके पास OpIndia, IChowk, और कई अन्य वेबसाइटों और ब्लॉगों पर कई लेख हैं। भगवद् गीता पर उनकी पहली पुस्तक "गीतायन" अमेज़न पर लॉन्च होने के पांच दिनों के भीतर स्टॉक से बाहर हो गई।

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