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“व्हाट्स एप्प यूनिवर्सिटी” कहकर किसी भी जानकारी, किसी सूचना का मजाक उड़ाया जाना आज कोई नई बात नहीं है। ये तब होता है जब आज के समाचार माध्यमों के काम काज का तरीका देखेंगे तो आप पायेंगे कि लगभग हर दिन पत्रकारों के पास सूचनाएं, प्रेस रिलीज़ वगैरह व्हाट्स एप्प ग्रुप्स के ही माध्यम से पहुँचती हैं। आम आदमी पार्टी के व्हाट्स एप्प ग्रुप से सात हिंदुस्तान टाइम्स के संवाददाताओं को निकाले जाने के लिए तो एक बार हंगामा भी हो चुका है। पत्रकार आगे, ब्यूरो प्रमुख-संपादक के पास सूचनाएं भेजने के लिए भी व्हाट्स एप्प ही इस्तेमाल करते पाए जाते हैं। फिर ऐसा क्यों है कि पेड मीडिया के एक बड़े धड़े को फ्री मीडिया, यानि सोशल मीडिया का मजाक उड़ाते पाया जाता है?

 

इस सवाल के जवाब के लिए हमें करीब 15 वर्ष पीछे जाना पड़ता है। हाल के समय में जब भाजपा के उत्तर प्रदेश के उम्मीदवारों की सूची आनी शुरू हुई, तब भी आपका कुछ बातों पर ध्यान गया होगा। पेड मीडिया में नौकरी करने वाले कई लोग अपने अपने “विश्वस्त सूत्रों” के माध्यम से ये बताने में जुट गए थे कि कौन से उम्मीदवारों का टिकट कट गया है और कौन सा उम्मीदवार कहाँ से चुनाव लड़ने वाला है। कई सूरमा तो योगी आदित्यनाथ के अयोध्या से चुनाव लड़ने के दावे ठोक रहे थे। जब उम्मीदवारों की सूचियाँ जारी होने लगी तो पता चला कि ये सारे दावे ही वो “व्हाट्स एप्प यूनिवर्सिटी” वाले थे जिसका मजाक बेचारे पक्षकार उड़ाते रहते थे।

तो करीब पंद्रह वर्ष पहले वाले जिस दौर की हम बात कर रहे हैं, उस वक्त भी कुछ ऐसा ही हुआ था। ये काफी विवादित और उतना ही दबाया गया मामला था राडिया टेप कांड। ये वो मामला था जिसमें इनकम टैक्स विभाग ने गृह मंत्रालय से आदेश लेने के बाद 2008-09 के बीच 300 दिनों तक नीरा राडिया के फोन टैप किया। जो बातचीत निकलकर आई वो लीक हो गयी और ओपन में उसके हिस्सों का ट्रांसक्रिप्शन प्रकाशित हुआ। इसके प्रकाशित होते ही हंगामा मच गया। इसमें कई राजनीतिज्ञों, पत्रकारों, और दूसरी नामी-गिरामी हस्तियों से बात चीत के ऐसे हिस्से थे जिसमें पत्रकार मंत्रालय किसे मिले ये तय करने में जुटे थे! मतलब जिनका कथित तौर पर निष्पक्ष होने का दावा होता वो उतने भी दूध के धुले नहीं थे। चूँकि इसमें कई नामी-गिरामी प्रकाशनों का नाम आ रहा था, तो जाहिर है अख़बारों-चैनल यानी पेड मीडिया के बड़े हिस्से ने इसपर चुप्पी साध ली।

 

इसकी बड़ी वजह ये थी कि इसमें अनैतिक पत्रकारिता के लिए अक्सर विवादित रही बरखा दत्त सुनाई देती हैं। इन्टरनेट आर्काइव में आज भी ये मिल जाता है। एक दूसरी बातचीत में वो गुलाम नबी आजाद का नाम लेकर काम करवा लेने का दावा करती सुनाई दी। जब पेड मीडिया ने इसपर चुप्पी कायम रखी तो फ्री सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर हंगामा होने लगा। हालाँकि भारतीय पेड मीडिया ने इसपर चुप्पी साधी और पुराने आर्टिकल ढूंढना भी लगभग नामुमकिन है, लेकिन विदेशी प्रकाशनों में इन्टरनेट पर अब भी ये मामला मिल जाता है। “द हिन्दू” के एन रवि की अपने कर्मचारियों को लिखी चिट्ठी, जिसमें वो स्वीकारते हैं कि कैसे प्रचार मिलने के बदले नेताओं का साक्षात्कार छपा, आज भी इन्टरनेट पर मौजूद है

 

फ्री सोशल मीडिया से उनकी नफरत की एक बड़ी वजह यही थी कि इसने ऐसे मामले की पोल खोल दी जो पक्षकारों की तथाकथित नैतिकता और निष्पक्षता के दावों की धज्जियाँ उड़ा देता था। आज भी ऐसे पेज सोशल मीडिया पर मौजूद हैं। वीर सांघवी और बरखा दत्त जैसे बड़े नामों ने ऐसे मामलों पर सफाई देनी शुरू की। हिंदुस्तान टाइम्स ने कहना शुरू किया कि अदालती करवाई चल रही है, और इस बहाने, मामले से दूरी बना ली। तब के “तहलका” में (जिसके प्रमुख बाद में यौन शोषण के आरोपी भी रहे) इस मामले पर सफाइयां और कुछ बातें छपी थीं। एनडीटीवी ने तो बरखा दत्त का समर्थन करते हुए ओपन मैगजीन के खिलाफ मुकदमा करने की धमकियाँ भी दी थीं। भारतीय पेड मीडिया की सबको चुप कराने की कोशिशों के बीच इस मुद्दे पर अरब न्यूज़ ने “डॉग ईटिंग डॉग्स” शीर्षक से खबर छापी

 

नीरा राडिया ने “द पायनियर” अख़बार पर भी मानहानि का मुकदमा किया था। इस विवादित मामले में कई राजनीतिज्ञों और पत्रकारों का नाम आया। इस मामले में कोई कार्रवाई न होने पर यदा-कदा सवाल उठते रहे हैं। हालाँकि बाद में सीबीआई पर इस मामले में कुछ न करने के लिए भी सवाल उठे। काफी बाद में इस मामले को देख रहे एक खोजी पत्रकार जोसी जोसफ ने अपनी किताब “ए फीस्ट ऑफ वल्चर्स” में भी लिखा था। जो भी हो, ये मामला टू-जी घोटाले से जुड़ा और काफी हंगामे के बाद भी अब तक इस मामले में कोई साफ़ तस्वीर नजर नहीं आती है। हाँ जो साफ़ नजर आता है वो ये है कि जो दूसरों पर ऊँगली उठाते रहते हैं, वो खुद भी कोई दूध के धुले तो नहीं हैं।

 

बाकी पेड मीडिया को आखिर फ्री सोशल मीडिया से इतनी चिढ़ क्यों है इसका पता तो चलता ही है। इसलिए अगली बार जब “व्हाट्स एप्प यूनिवर्सिटी” का जुमला उछाला जाए तो राडिया-गेट भी याद दिला दीजियेगा!

By anandkumar

आनंद ने कंप्यूटर साइंस में डिग्री हासिल की है और मास्टर स्तर पर मार्केटिंग और मीडिया मैनेजमेंट की पढ़ाई की है। उन्होंने बाजार और सामाजिक अनुसंधान में एक दशक से अधिक समय तक काम किया। दोनों काम के दायित्वों के कारण और व्यक्तिगत हित के रूप में उन्होंने पूरे भारत में यात्रा की। वर्तमान में, वह भारत के 500+ जिलों में अपना टैली रखता है। पिछले कुछ वर्षों से, वह पटना, बिहार में स्थित है, और इन दिनों संस्कृत में स्नातक की पढ़ाई पूरी कर रहें है। एक सामग्री लेखक के रूप में, उनके पास OpIndia, IChowk, और कई अन्य वेबसाइटों और ब्लॉगों पर कई लेख हैं। भगवद् गीता पर उनकी पहली पुस्तक "गीतायन" अमेज़न पर लॉन्च होने के पांच दिनों के भीतर स्टॉक से बाहर हो गई।

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