कई लघुकथाएँ अपने पूरे अंत पर नहीं पहुँचती। उसके पाठक उसके अंत की चर्चा करते हैं, कभी पहले तो कभी दूसरे विकल्पों की चर्चा करते हैं। “पुण्यपथ” के नाम में ही पथ, यानी कोई मार्ग, कोई रास्ता है। वो भला कहीं ख़त्म क्यों होती? कहानी का अंत जिस पन्ने पर होता है, वहाँ खड़ी रागनी के लिए भी रास्ता खुला हुआ ही होता है। वो इस ओर जाएगी या उस ओर, इस बड़े से सवाल पर कहानी लेखक की ओर से ख़त्म और पाठक की ओर से शुरू हो जाती है। ये उपन्यास जितने जवाब देता है, उतने ही सवाल खड़े कर जाता है। अगर आप मीठी सी प्रेम कथाओं के शौक़ीन हैं, तो मेरी सलाह होगी कि इसे मत पढ़िए।

 

इस किताब का नाम “पुण्यपथ” इसलिए है क्योंकि एक इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान में केवल एक हिन्दू होने के कारण प्रताड़ना झेलता हुआ व्यक्ति जब घर छोड़कर एक विस्थापित बनकर निकलता है, तो भारत की ओर जाता हुआ मार्ग उसे पुण्यपथ ही लगता है। वो सोचता है कि ये वो रास्ता है जिसपर से गुजरता हुआ वो केवल जीवन ही नहीं अपने धर्म को भी बचा लेगा। जीवन तो खैर, धर्म छोड़ देने पर भी बच ही जाता! सैकड़ों मील का सफर और देशों की सीमाएँ पार करना उतना आसान नहीं होता। फिर भी इस रास्ते पर उसे पैर ऐसे उठते हैं जैसे हर कदम पर वो एक पुण्य करता हो। क्या इस “पुण्यपथ” को पार करने पर उसे कोई पुण्यभूमि मिलती है?

ये एक बड़ा सा सवाल है जो हम सबके सामने होता है। अक्सर किसी फ्लाईओवर किसी झुग्गी के पास से गुजरते हुए, हम सभी ने गरीबी देखी तो होती है, मगर फिर भी हम उसे नहीं देखते। प्लास्टिक-कूड़ा बीनते बच्चों को जैसे हम देखकर भी अनजान बने रहते हैं। कुछ वैसा ही इन विस्थापितों के साथ भी होता है। मजनू के टीले के इलाके के आस पास के किस्से जब साहित्यकार अपनी नशे की तलब पूरी करने के किस्सों के साथ सुनाते भी हैं, तो वहीँ के तम्बुओं में गुजारा करते ये विस्थापित उनकी संवेदनशील दृष्टि से कैसे बचे रहे। जरूर अंधे हो जाते होंगे, और कोई वजह तो समझ में नहीं आती।

 

अच्छा है जो समय बदला और केवल एक टोली के लोगों के हाथ से लेखन के अधिकार आम लोगों तक भी पहुंचे। जबतक “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” एक गिरोह की बपौती थी, हम ऐसी कहानियों के प्रकाशित होने की उम्मीद तो नहीं कर सकते थे। अच्छा है कि “पुण्यपथ” के लेखक सर्वेश तिवारी ‘श्रीमुख’ मुश्किल सवालों से कतराते नहीं। उनकी पिछली कृति “परत” भी ऐसे ही मुश्किल सवालों पर आधारित थी और एक धर्म की लड़की के किसी दूसरे मजहब के लड़के से निकाह की कहानी सुनाती थी। “परत” बेस्टसेलर रही थी। हम आशा कर रहे हैं कि हर्फ़ प्रकाशन से आया उनका ये डेढ़ सौ पन्नों के लगभग का उपन्यास, “पुण्यपथ” भी सफलता के नए झंडे गाड़ेगा।

By Shubhendu Prakash

शुभेन्दु प्रकाश 2012 से सुचना और प्रोद्योगिकी के क्षेत्र मे कार्यरत है साथ ही पत्रकारिता भी 2009 से कर रहें हैं | कई प्रिंट और इलेक्ट्रनिक मीडिया के लिए काम किया साथ ही ये आईटी services भी मुहैया करवाते हैं | 2020 से शुभेन्दु ने कोरोना को देखते हुए फुल टाइम मे जर्नलिज्म करने का निर्णय लिया अभी ये माटी की पुकार हिंदी माशिक पत्रिका में समाचार सम्पादक के पद पर कार्यरत है साथ ही aware news 24 का भी संचालन कर रहे हैं , शुभेन्दु बहुत सारे न्यूज़ पोर्टल तथा youtube चैनल को भी अपना योगदान देते हैं | अभी भी शुभेन्दु Golden Enterprises नामक फर्म का भी संचालन कर रहें हैं और बेहतर आईटी सेवा के लिए भी कार्य कर रहें हैं |

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