Folk Tales

डोम बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल जैसी जगहों पर ज्यादा संख्या में होते हैं। आज बिहार में ये जाति महादलित में गिनी जाती है। गाना – बजाना और बांस की टोकरियाँ बनाना इनका मुख्य पेशा होता है। भारत के इस्लामिक शासन के काल में इन्हें राज सत्ता का विरोध झेलना पड़ा था। इसके दो प्रमुख कारण थे, एक तो ये लोग गाने-बजाने में लगे होते थे जिसे कई लोग इस्लामिक नियमों के खिलाफ मानते थे। दूसरा कारण उस से बड़ा था, डोम परंपरागत रूप से सूअर पालते हैं और खाते भी हैं!

 

शासन का विरोध झेलने के बाद भी इन लोगों के बच जाने का कारण इनकी चतुराई को माना जाता है। इनकी चतुराई की कई लोक कथाएं भी प्रचलित हैं बिहार में। इस से पहले की ऐसी कहानियां खो जाएँ एक और कहानी पेश ए खिदमत है।

 

तो हुआ यूँ की डोम और डोमिन दोनों अपनी बांस की टोकरियाँ, सूप, डगरा इत्यादि लेकर शहर में बेचने निकले। नगर से गाँव के रास्ते में जंगल था और लौटते लौटते वहीँ रात हो गई। अब अँधेरे में तो कहीं जाया नहीं जा सकता था तो इधर उधर दोनों ने कोई आसरा ढूँढने की कोशिश की। वहीँ वीराने में एक बड़ी सी हवेली सी दिखी। दोनों वहां पहुंचे और मकान के बाहर से आवाज लगाई। थोड़ी देर तक जब कोई बाहर नहीं आया तो दोनों अन्दर गए। पूरी हवेली में कोई नहीं था, लेकिन बड़े बड़े बिस्तर सजे थे और खाने पीने का भी इंतजाम था। दोनों पूरी हवेली का चक्कर लगा कर ऊपर वाले कमरे में जा बैठे। सबसे सुरक्षित वही कमरा लगा तो दोनों ने वहीँ रात बिताने की सोची।

 

दोनों अन्दर से दरवाजे बंद कर के सो गए। रात के दो पहर बीत जाने पर, आधी रात को हवेली के मालिक एक राक्षस और राक्षसी हवेली पर वापस आये। बाहर पहुँचते ही राक्षसी को मनुष्यों की गंध आई। राक्षसी चिल्लाई “मनु-गंध मनु-गंध मनु-गंध मनु-गंध”। दरवाजा अन्दर से बंद देखकर राक्षस भी गरजा, “मेरे घर में कौन रे ?” अब तो डोम-डोमिन की हालत पतली हो गई ! लेकिन हिम्मत हारने का मतलब था कि राक्षस दोनों को खा जाते। आखिर डोम ने हिम्मत जुटा कर जवाब दिया, “तोरो से बड वीर रे !”

 

राक्षस ने फिर बाहर से पुछा, “देखूं तेरा निशान रे ?” डोम ने अपनी एक टोकरी खिड़की से नीचे फेंक दी और चिल्लाया, “देख मेरा टोप रे !” राक्षसी ने टोकरी उठाई और दोनों चिंता में पड़ गए ! जो इतनी बड़ी टोपी पहनता है वो खुद कितना बड़ा होगा ? दोनों “भाग-भाग” चिल्लाते अपने दोस्तों से मदद मांगने भागे। डोम-डोमिन हवेली में ही रहे।

 

एक पहर बीतते ही राक्षस-राक्षसी अपने दो चार मित्रों के साथ फिर अपनी हवेली पर पहुंचे। राक्षस के मित्रों ने डर के भाग जाने के कारण उसे खूब चिढ़ाया था। इस बार भी नीचे पहुँच कर राक्षस चिल्लाया, “मेरे घर में कौन रे ?” डोम बोला, “तोरो से बड बीर रे !” राक्षस फिर बोला, “देखूं तोहर निशान रे !” डोम ने इस बार एक डगरा नीचे फेंक दिया और चिल्लाया, “देख मेरा कान रे !” इतना बड़ा कान देखते ही राक्षस राक्षसी और उनके मित्र सब “भाग-भाग” कहते अपने और मित्रों को बुलाने भागे।

 

रात का चौथा पहर हुआ और सुबह होने में अब थोड़ी ही देर थी कि राक्षस-राक्षसी और उनके ढेर सारे राक्षस, पिशाच, और दानव मित्र फिर से हवेली के नीचे इकठ्ठा हो गए। संख्या में ज्यादा होने के कारण उनका हौसला थोडा बढ़ा था। राक्षस फिर चिल्लाया, “मेरे घर में कौन रे ?” डोम बोला, “तोरो से बड बीर रे !” राक्षस फिर बोला, “देखूं तोहर निशान रे !” डोम ने इस बार एक सूप नीचे फेंक दिया और चिल्लाया, “देख मेरा दांत रे !” इतना बड़ा दांत देखते ही राक्षस राक्षसी और उनके मित्र सब “भाग-भाग” कहते हुए कहीं ये हम सब को ही ना खा जाए ये सोचकर भागे।

 

चौथा पहर बीता, सुबह हुई तो डोम-डोमिन भगवान का शुक्र मानते, नीचे से सारे फेंके हुए बांस की टोकरियाँ इत्यादि समेटकर, ख़ुशी-ख़ुशी अपने गाँव की तरफ वापिस चले।

 

ये लोककथा इसलिए क्योंकि ये स्थानीय होती हैं, हर इलाके में अलग-अलग होती हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी ये लोककथाएँ दादी-नानी से बच्चों तक पहुँचती रहती थीं। जब सामाजिक परिवेश बदलने लगा तो संयुक्त परिवार रहे नहीं और ऐसी कहानियां खोने लगीं। इसका नुकसान ये हुआ कि जब ब्रेकिंग इंडिया वाले कहते हैं कि लोककथाएँ केवल राजा रानियों की कहानियां होती हैं, उसमें आम लोगों की बात नहीं होती, तो ये झूठ भी नयी पीढ़ी को सच लगने लगता है। पाठ्यक्रमों में बदलाव से ये समस्या सुलझाई जा सकती थी। हर क्षेत्र की स्थानीय भाषा की लोककथाओं को हिंदी में एक किताब बनाकर शामिल किया जा सकता था। अफ़सोस कि बाकी कई मुद्दों की तरह, शिक्षा नीति के मामले में भी विफल रही मौजूदा सरकार ने सात वर्षों में शैक्षणिक सुधारों के लिए कुछ नहीं किया।

 

वैसे अभी कई वर्ष बाकी हैं, टुकड़ाखोरों के फेंके सूप-डगरा देखकर ही तथाकथित राष्ट्रवादी मंत्री अपना घर छोड़कर भाग खड़े होंगे, या भारतीय बच्चों को भारत के बारे में ना पढ़ाने का विरोध करने का साहस भी रखते हैं, ये देखने लायक बात होगी!

By Shubhendu Prakash

शुभेन्दु प्रकाश 2012 से सुचना और प्रोद्योगिकी के क्षेत्र मे कार्यरत है साथ ही पत्रकारिता भी 2009 से कर रहें हैं | कई प्रिंट और इलेक्ट्रनिक मीडिया के लिए काम किया साथ ही ये आईटी services भी मुहैया करवाते हैं | 2020 से शुभेन्दु ने कोरोना को देखते हुए फुल टाइम मे जर्नलिज्म करने का निर्णय लिया अभी ये माटी की पुकार हिंदी माशिक पत्रिका में समाचार सम्पादक के पद पर कार्यरत है साथ ही aware news 24 का भी संचालन कर रहे हैं , शुभेन्दु बहुत सारे न्यूज़ पोर्टल तथा youtube चैनल को भी अपना योगदान देते हैं | अभी भी शुभेन्दु Golden Enterprises नामक फर्म का भी संचालन कर रहें हैं और बेहतर आईटी सेवा के लिए भी कार्य कर रहें हैं |

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