Redtapism And Backward Class of Bihar | लालफीताशाही और बिहार का दलित |



शिक्षा और अधिकारों की हिस्सेदारी में कहीं पीछे छूट गया बिहार का दलित समाज उस वक्त भी चर्चा में आया था जब दलितों के अन्दर एक महादलित वर्ग की घोषणा हुई थी। तब कहीं जा कर लोगों को पता चला था कि इतने वर्षों तक आरक्षण देने के बाद भी आज किसी स्कूल का हेडमास्टर तक डोम समाज से नहीं आता।

लेकिन ये तो बस कुव्यवस्था की एक बानगी भर थी। ऐसी कई छोटी छोटी चीज़ें हैं जो इन समुदायों को मुख्यधारा तक पहुँचने से काफी पहले रोक देती हैं। चाहे फिर वो मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा हो या शारीरिक पोषण का, शिक्षा के उनके अधिकार हों या अधिकारों के बारे में उनकी जागरूकता। हर क्षेत्र ही ऐसा है जहाँ लालफीताशाही उन्हें पीछे धकेल देती है।

ये कहानी है एक ऐसे ही परिवार की जिसके मुखिया की मृत्यु के बाद परिवार को सिर्फ कागज़ी कार्यवाही के लिए वर्षों एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर चक्कर काटना पड़ा।
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By Shubhendu Prakash

शुभेन्दु प्रकाश 2012 से सुचना और प्रोद्योगिकी के क्षेत्र मे कार्यरत है साथ ही पत्रकारिता भी 2009 से कर रहें हैं | कई प्रिंट और इलेक्ट्रनिक मीडिया के लिए काम किया साथ ही ये आईटी services भी मुहैया करवाते हैं | 2020 से शुभेन्दु ने कोरोना को देखते हुए फुल टाइम मे जर्नलिज्म करने का निर्णय लिया अभी ये माटी की पुकार हिंदी माशिक पत्रिका में समाचार सम्पादक के पद पर कार्यरत है साथ ही aware news 24 का भी संचालन कर रहे हैं , शुभेन्दु बहुत सारे न्यूज़ पोर्टल तथा youtube चैनल को भी अपना योगदान देते हैं | अभी भी शुभेन्दु Golden Enterprises नामक फर्म का भी संचालन कर रहें हैं और बेहतर आईटी सेवा के लिए भी कार्य कर रहें हैं |

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