भारत, इस्राइल और अमेरिका मिलकर बना रहे एक दवा, इस दुर्लभ बीमारी का इलाज होगा मुमकिन

भारत, इस्राइल और अमेरिका के रिसर्चर्स एक खास दवा को तैयार करने के लिए साथ आए हैं, जिसके इस्‍तेमाल से एक दुर्लभ बीमारी का इलाज होने की उम्‍मीद है। आईआईटी मद्रास, तेल अवीव यूनिवर्सिटी और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स जिस बीमारी पर शोध कर रहे हैं, उसका नाम है- ‘जीएनबी1 एन्सेफैलोपैथी’ (GNB1 Encephalopathy)। यह एक रेयर जेनेटिक मस्तिष्क रोग है, जिसका प्रभावी इलाज करने के लिए रिसर्चर्स एक दवा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। दुनियाभर में आजतक इस बीमारी के 100 से कम मामलों की जानकारी है, लेकिन असल आंकड़ा अधिक हो सकता है, क्‍योंकि इस बीमारी को पहचानने में ही काफी खर्च आता है। 

पीटीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, GNB1 एन्सेफैलोपैथी एक प्रकार का तंत्रिका संबंधी विकार (neurological disorder) है, यह किसी व्‍यक्ति को तभी अपनी गिरफ्त में ले लेता है, जब वह अपनी मां के गर्भ में होता है यानी फीटस स्‍टेज के दौरान।  

इस बीमारी के शुरुआती लक्षणों की बात करें, तो शारीरिक और मानसिक विकास में देरी, बौद्धिक अक्षमता (intellectual disabilities), बार-बार मिर्गी का दौरा पड़ना शुरुआती लक्षणों में शामिल हैं। इसका पता जीनोम-सीक्वेंसिंग के जरिए किया जाता है जोकि एक महंगी प्रक्रिया है, इसीलिए कई पैरंट्स इलाज आगे नहीं ले जाते। 

रिपोर्ट के अनुसार, IIT मद्रास की पूर्व पीएचडी स्कॉलर हरिता रेड्डी ने बताया कि यह बीमारी ‘Gβ1 प्रोटीन’ के कारण होती है, जो GNB1 जीन में म्‍यूटेशन की वजह से बनता है। यह म्‍यूटेशन भ्रूण को प्रभावित करता है। GNB1 म्‍यूटेशन के साथ पैदा हुए बच्चे मानसिक और शारीरिक विकास में देरी, मिर्गी आदि समस्याओं को एक्‍सपीरियंस करते हैं। दुनियाभर में आजतक ऐसे 100 से कम मामले पहचाने गए हैं। हरिता रेड्डी का मानना है कि प्रभावित बच्चों की असल संख्‍या इससे ज्‍यादा है, क्‍योंकि बीमारी का इलाज उपलब्‍ध नहीं है। 

आईआईटी मद्रास के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के प्रोफेसर अमल कांति बेरा के अनुसार, जीएनबी1 एन्सेफैलोपैथी एक दुर्लभ बीमारी है, जिसे पर ज्‍यादा स्‍टडी नहीं हुई है। उन्‍होंने कहा कि यह बीमारी कैसे कम हो सकती है और इलाज कैसे किया जाए, हम इस बारे में अभी कुछ नहीं जानते। बीमारी पर शोध करना जरूरी है। दवा विकसित करना आसान नहीं है और हमें लंबा सफर तय करना है।  

फ‍िलहाल रिसर्चर्स बीमारी के प्रीक्लिनिकल एनिमल मॉडल डेवलप कर रहे हैं। उन्‍हें उम्मीद है कि 3 साल में पर्सनलाइज्‍ड डिजीज मॉडल विकसित हो जाएंगे, जिससे रिसर्च और ड्रग स्‍क्रीनिंग में मदद मिलेगी। रिसर्च में शामिल
तेल अवीव यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर नाथन डैस्कल का मानना है कि जब किसी भ्रूण का विकास शुरू होता है, तब इस बीमारी के असर को कम करने के लिए जीन थेरेपी सबसे अच्‍छा ऑप्‍शन हो सकती है। हालांकि इसे डेवलप करने में कई साल और बहुत सारा पैसा लगेगा। यह भी हो सकता है कि मौजूदा दवाइयों के कॉम्बिनेशन से इलाज में मदद मिले। 
 

By MINIMETRO LIVE

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