श्रीमद्भगवद्गीता — भगवानुवाच | श्लोक संख्या 14
अध्याय 2 | श्लोक 22
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर प्राप्त करती है।
शरीर की आयु होती है, आत्मा की नहीं।
मृत्यु केवल शरीर का अंत है—गीता का यह श्लोक आत्मा की निरंतरता को समझने का दृष्टिकोण देता है।
“वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि…”
✍️ शुभेन्दु प्रकाश
Platform: Aware News 24
Category/Column: धर्म का मर्म
राधे-राधे। 🌿🙏🏻
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