ऐनी फ्रैंक का परिवार लिबरल यहूदी परिवार था। कहने का मतलब जैसे कई हिन्दू सभी धार्मिक परम्पराओं का पालन नहीं करते, वैसे ही वो लोग भी सभी परम्पराओं का पालन नहीं करते थे। मगर इससे क्या फर्क पड़ता है? जर्मन ईसाइयों को लगता था कि यहूदी ही उनकी सभी समस्याओं की जड़ हैं। जब यहूदियों पर जर्मन ईसाइयों ने जुल्म शुरू किये तो ऐनी फ्रैंक को भी दूसरे कई यहूदियों की तरह छुपना पड़ा। अपने तेरहवें जन्मदिन पर (12 जून 1942) ऐनी फ्रैंक को एक ऑटोग्राफ बुक उपहार में मिला और फ़ौरन ही उसने इसे डायरी की तरह इस्तेमाल करने का फैसला कर लिया। आज आपको डायरी के पन्ने पढ़ते हुए उसकी बातें बिलकुल वैसी ही लगेंगी जैसी सेक्युलर, लिबरल हिन्दू किशोरियों की बातें हो सकती हैं। चाहें तो कोशिश करके देख सकते हैं।

अपनी 5 अप्रैल 1944 की एंट्री में ऐनी फ्रैंक ने लिखा था कि वो अपनी माँ या श्रीमती वैन डैन जैसी नहीं होना चाहती, जो जिन्दगी भर काम करती रहती हैं और मरने के बाद भुला दी जाती हैं। इसी दिन वो ये भी लिखती हैं कि वो आगे कभी जर्नलिस्ट बनना चाहती है। उसका मानना था कि भले वो किताबें छपवाने जैसा, या अख़बारों में प्रकाशित होने जैसा न लिख पाए, लेकिन वो अपने खुद के लिए तो लिख ही सकेगी।  अपनी माँ से नाराजगी के बारे में भी वो लिखती है। एक कमरे में, या घर के अन्दर बंद होना कैसा होता है, ये अब अधिकांश लोगों को चीनी वायरस के प्रकोप के बाद पता होगा। इसलिए ऐनी फ्रैंक किन मनोस्थितियों से गुजरी होगी, उसे महसूस कर पाना मुश्किल नहीं होता। शायद ये भी एक वजह है कि करीब सौ वर्ष पहले लिखी गयी इस डायरी को आज पढ़ना बिलकुल भी अजीब नहीं लगता।

 

ऐनी फ्रैंक और उसका परिवार 6 जुलाई 1942 को अपने छुपने की जगह पर पहुंचा था। उन्हें 4 अगस्त 1944 को गिरफ्तार कर लिया गया। वो करीब दो वर्षों तक एक ही घर में किताबों की अलमारी के पीछे की जगह से बने गुप्त रस्ते वाले कमरे में छुपे रहे। नाज़ियों के कंसंट्रेशन कैंप में ही बीमारी की वजह से 1945 की शुरुआत में अन्नी फ्रैंक की मौत हो गयी। उसकी मौत के बाद ओट्टो फ्रैंक (उसके पिता) को ऐनी फ्रैंक की डायरी मिल गयी। ये पहली बार स्कॉटिश में ही 1947 में प्रकाशित हुई और 1950 तक ये काफी प्रसिद्ध हो चुकी थी। इस डायरी के सत्य होने पर कई बार सवाल उठाये गये। हेराल्ड निल्सन ने 1957 में इसके सत्य होने पर सवाल किये और 1958 में तो विरोधियों के एक दल ने पूछ लिया कि अगर ऐनी फ्रैंक नाम की कोई थी, तो उसे गिरफ्तार करने वाला कार्ल सिएल्बेरबौर कहाँ है?

 

कुछ-कुछ वैसी ही बात है जैसे आज रानी पद्मिनी (पद्मावती) होती भी थी या नहीं, ये पूछ लिया जाता है। साइमन वेइसिनथाल ने 1963 में कार्ल सिएल्बेरबौर को ढूंढ निकाला। उसकी गवाही से स्पष्ट हो गया कि जिस तरीके से गिरफ्तार किया गया था, जो दस्तावेज गवाही के वक्त गिरे थे, वो सचमुच के थे। ऐनी फ्रैंक पर सवाल उठने यहीं बंद नहीं हुए थे। लोथर नाम के एक व्यक्ति ने 1959 में इस डायरी को फर्जी बताना शुरू कर दिया था। ओट्टो फ्रैंक ने उसके खिलाफ भी मुकदमा कर दिया। फ्रैंकफर्ट के हेंज रोथ के खिलाफ 1976 में ओट्टो फ्रैंक को मुकदमा करना पड़ा। अदालतों में ऐनी फ्रैंक की लिखी पुरानी चिट्ठियों और डायरी के पन्नों की हैण्डराइटिंग के जरिये ये सिद्ध हुआ कि डायरी सचमुच उसी ने लिखी थी। इसके बाद भी ऐसे आक्षेप बंद नहीं हुए। नीदरलैंड में 1993 और एम्स्टर्डम में 1998 तक अदालती आदेशों को डायरी का विरोध करने वालों पर करवाई करनी पड़ी है।

 

वो लड़की जो अपनी माँ की तरह गुमनाम मौत नहीं मरना चाहती थी, ऐसा लगता है कि करीब सौ वर्ष बीतने पर भी मरी नहीं है। बंद कमरों में बैठे डायरी लिखने पर फिर से ऐनी फ्रैंक की याद आ ही जाती है। चूँकि ये किताब असल में किताब भी नहीं, एक तेरह-चौदह वर्ष की बच्ची की लिखी डायरी है, इसलिए अगर ये समझना हो कि उस उम्र में लोग कैसे सोचते हैं, तो ये डायरी पढ़ी जा सकती है। घर में बच्चों को देने के लिए तो ये एक अच्छी किताब होगी ही।

 

(ये हिंदी और कई दूसरी भाषाओँ में भी आती है) ऐनी फ्रैंक की डायरी का अमेज़न लिंक

By Shubhendu Prakash

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