यह बात शायद नितिन गडकरी साहब के नाम से जोड़ी गई। उन्होंने लिव-इन रिलेशनशिप का विरोध भी किया।
लेकिन एक सवाल किसी ने नहीं पूछा—
👉 क्या महिलाओं से यह पूछा गया कि उन्हें यह स्वीकार है या नहीं?
जब भी विवाह, परिवार या समाज की बात आती है, निर्णय पुरुष करता है, मानो स्त्री कोई विकल्प नहीं बल्कि वस्तु हो।
पुरुष तय करेगा कि वह एक करेगा, दो करेगा या तीन करेगा—
पर यह कभी नहीं सोचा जाता कि स्त्री भी चयन कर सकती है।
फिर सवाल उठता है—
👉 अगर संख्या का तर्क है, तो दो या तीन महिलाएँ मिलकर एक पुरुष का वरण क्यों नहीं कर सकतीं?
शायद इसलिए कि इससे पुरुष के आत्मसम्मान और वर्चस्व को चोट पहुँचती है।
बराबरी की बात अक्सर भाषणों तक सीमित रहती है;
व्यवहार में स्वामित्व और नियंत्रण ही असली सोच है।
मालिक और मालकिन की बात आते ही
पुरुष झंडा लेकर सबसे आगे खड़ा हो जाता है,
चाहे संख्या में वह कम ही क्यों न हो।
आरक्षण की बात हो, संरक्षण की या “कमज़ोर” बताकर अधिकार देने की—
वहाँ भी कहीं न कहीं खुद को महान साबित करने की मंशा छुपी रहती है।
इतिहास और शास्त्रों में उदाहरण मौजूद हैं—
शकुंतला–दुष्यंत का गंधर्व विवाह,
भीम–हिडिंबा का संबंध,
पहले विवाह न होने की परंपराएँ—
लेकिन जहाँ पुरुष का वर्चस्व खतरे में पड़ता है,
वहीं वे पन्ने फाड़कर फेंक दिए जाते हैं।
मैं यह नहीं कह रहा कि कोई व्यवस्था थोपी जाए।
मैं सिर्फ़ यह कह रहा हूँ कि सोचने का दायरा बराबरी का हो।
हाँ, मैं मानता हूँ—
मैं बहुत बेवकूफ आदमी हूँ।
मुझे इसमें कोई शर्म नहीं कि मेरी आने वाली पीढ़ी में
स्त्री वरण करे,
और मेरा भी करे।
लेकिन आज के समाज में यह संभव नहीं।
और शायद इसलिए मैं ऐसा ही हूँ—
और मुझे ऐसा ही रहने दीजिए।
राधे राधे।
मैं यह नहीं कह रहा कि कोई व्यवस्था थोपी जाए।
मैं सिर्फ़ यह कह रहा हूँ कि सोचने का दायरा बराबरी का हो।
हाँ, मैं मानता हूँ—
मैं बहुत बेवकूफ आदमी हूँ।
मुझे इसमें कोई शर्म नहीं कि मेरी आने वाली पीढ़ी में
स्त्री वरण करे।
(स्पष्ट कर दूँ— लेखक स्वयं विवाहित है, इसलिए उसका वरण संभव नहीं है।)
यह बात निजी जीवन की नहीं,
सामाजिक सोच की है।
लेकिन आज के समाज में यह सोच संभव नहीं।
और शायद इसी वजह से
यह पूरा लेख एक बेजोड़ व्यंग बन जाता है—
जो बराबरी की बात करने वाले समाज के
असल चेहरे को दिखाता है।
राधे राधे।
