- प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के निर्माण का विरोध करते हुए 17 से अधिक पत्र लिखे थे।
- राष्ट्रपति और मंत्रिमंडल के मंत्रियों को पत्र लिखे: नेहरू ने राष्ट्रपति और मंत्रिमंडल को लिखे पत्रों में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की आवश्यकता पर सवाल उठाया और उन्हें सख्ती से उद्घाटन समारोह में शामिल होने से मना किया।
- पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को पत्र लिखा : पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को लिखे पत्र में नेहरू ने उन्हें “प्रिय नवाबजादा” कहकर संबोधित किया और पुनर्निर्माण के महत्व को निरर्थक बताया।
- सार्वजनिक प्रसारकों को निर्देश दिए गए: नेहरू ने उन्हें मंदिर पुनर्निर्माण के कवरेज कम करने और इसके महत्व को कमतर करके बताने का निर्देश दिया।
- भारतीय मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा : नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को दो बार पत्र लिखा और पुनर्निर्माण को “पुरानी मान्यताएं कायम करने के प्रयास” और “आंडबरपूर्ण” बताया। उन्होंने शिकायत की कि इससे विदेशों में भारत की छवि को नुकसान पहुंचा है।
- भारतीय दूतावासों को निर्देश : उन्होंने दूतावासों को सोमनाथ ट्रस्ट को किसी भी प्रकार की सहायता देने से साफ तौर पर मना किया, जिसमें अभिषेक समारोह के लिए नदी के जल के लिए अनुरोध भी शामिल था।
- इन पत्रों को समग्र रूप से देखने पर जवाहरलाल नेहरू का सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के प्रति निरंतर विरोध और उनकी असहजता स्पष्ट होती है।
- 21 अप्रैल 1951 – पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को पत्र
जवाहरलाल नेहरू ने लियाकत अली खान को आश्वस्त करते हुए पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने सोमनाथ द्वार की घटना को “पूरी तरह से मिथ्या” बताया और इस बात पर जोर दिया कि ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा।
पाकिस्तान के दुष्प्रचार का सामना करने या भारत की सभ्यतागत स्मृति की रक्षा करने के बजाय, उन्होंने हिंदू ऐतिहासिक प्रतीकों को कमतर बताकर पाकिस्तान को दिलासा देना चुनते हुए और आंतरिक विश्वास की बजाय बाहरी तुष्टीकरण को प्राथमिकता दी।

28 अप्रैल 1951 – भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्री आर.आर. दिवाकर को पत्र
जवाहरलाल नेहरू ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से सोमनाथ अभिषेक समारोह के कवरेज कम करने को कहा, समारोह को आडंबरपूर्ण बताया और कहा कि यह समारोह विश्व में भारत की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है। उन्होंने यह भी लिखा कि सोमनाथ समारोह उन्हें बहुत चिंतित करता है और वे इस समारोह में राष्ट्रपति के भाग लेने से खुश नहीं हैं।

मुख्यमंत्रियों को 2 मई 1951 को लिखा पत्र
नेहरू ने सोमनाथ की प्रतिष्ठापन के प्रति व्यापक जनसमर्थन और अपने सहयोगियों की भागीदारी के बावजूद मुख्यमंत्रियों को दो पत्र लिखे, जिनमें उन्हें बार-बार सोमनाथ समारोहों से भारत सरकार को अलग रखने को कहा।नेहरू ने धर्मनिरपेक्षता का हवाला देकर इस समारोह से न जुड़ने को उचित ठहराते हुए, प्रभावी रूप से हिंदू सभ्यता के पुरानी मान्यताओं को राजनीतिक जोखिम बताया। इस कदम से नेहरू ने राष्ट्रीय महत्व के ऐतिहासिक सुधार को दिखावा बता कर इसका महत्व सीमित कर दिया और लोकप्रिय धार्मिक भावनाओं को देश के शासन द्वारा सम्मान देने के बजाय नियंत्रित करने की आवश्यकता के रूप में पेश किया।

मुख्यमंत्रियों को पहली अगस्त 1951 को पत्र
जवाहरलाल नेहरू ने अपने इस पत्र में सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन की “तड़क-भड़क और समारोह” को “विदेशों में बहुत बुरा प्रभाव” डालने और भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि कमजोर करने वाला बताया। पाकिस्तान के शत्रुतापूर्ण मिथ्या प्रचार पर सवाल उठाने के बजाय, उन्होंने हिंदू धार्मिक अभिव्यक्ति को ही समस्या मान लिया और तर्क दिया कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण ने भारत की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया है। नेहरू ने एक बार फिर सभ्यतागत अभिव्यक्ति को बाहरी दुष्प्रचार से बचाने के बजाय इसे कूटनीतिक बोझ के रूप में प्रस्तुत किया।


20 जुलाई 1950 को केंद्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री के.एम. मुंशी को पत्र
मुंशी को लिखे पत्र में, नेहरू ने सवाल उठाया कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण क्यों किया जाना चाहिए जबकि देश आवास की कमी का सामना कर रहा है और खराब आर्थिक स्थिति से गुजर रहा है। नेहरू ने सभ्यतागत पुनरुद्धार के सदियों पुराने प्रतीक को केवल हिसाब-किताब की समस्या में बदल दिया और राष्ट्र के लिए इस ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्व के निर्माण के पक्ष में कदम उठाने की बजाय हिंदू धार्मिक पुनरुत्थान को अमान्य गैर-जरूरी बताने के बहाने के तौर पर आर्थिक कठिनाई की बात उठाई।

उपराष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन को 13 जून, 1951 का पत्र
इस पत्र में उन्होंने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन को अनावश्यक “झंझट” बताते हुए इसे खारिज कर दिया और स्वीकार किया कि उन्होंने कैबिनेट मंत्रियों को इससे जुड़ने से रोकने का प्रयास किया था।

के.एम. पणिक्कर (चीन में भारत के राजदूत) को 17 अप्रैल 1951 का पत्र
इस पत्र, में नेहरू ने सबके समक्ष यह स्वीकार किया था कि उन्होंने राष्ट्रपति के सोमनाथ मंदिर के दौरे “के प्रभावों को नरम करने” का प्रयास किया था। यह स्पष्ट रूप से इसकी स्वीकृति है कि केवल तटस्थ रहने की जगह मंदिर के उद्घाटन के महत्व को गौण करने की यह एक सक्रिय कोशिश थी।

यू. एन. धेवर (सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री) को 21 अप्रैल 1951 का पत्र
जवाहरलाल नेहरू ने अपने इस पत्र में सोमनाथ समारोह के लिए उपयोग किए जाने वाले सार्वजनिक फंड के प्रति आपत्ति जताई थी और यह तर्क देने के लिए कि मंदिर सरकार का मामला नहीं है, धर्मनिरपेक्ष औचित्य का आह्वान किया था। यह एक बड़ा विरोधाभास है: जहां अन्य धार्मिक संरचनाओं के लिए सरकार की सहायता को उचित ठहराया गया था, जैसे ही सभ्यतागत पुनरोत्थान के प्रतीक एक हिंदू मंदिर का मामला आया, नेहरू को राजकोषीय चिंता और संवैधानिक संकोच का स्मरण होने लगा। यह प्रदर्शित करता है कि अपनी सुविधानुसार धर्मनिरपेक्षता का उपयोग तभी किया गया जब हिंदू विरासत के लिए सार्वजनिक स्वीकृति की आवश्यकता पड़ी।

दिग्विजय सिंह जी (नवानगर के जाम साहब) को 22 अप्रैल, 1951 का पत्र
जवाहरलाल नेहरू ने पवित्र नदी जल और मिट्टी के लिए विदेशी मिशनों के पास जाने के सोमनाथ ट्रस्टियों को लेकर प्रत्यक्ष रूप से चिंता जताई थी और कहा था कि इसने एक गलत सरकारी धारणा को जन्म दिया है। उन्होंने विदेशी संवेदनशीलताओं और भारत की अपनी सभ्यतागत अभिव्यक्तियों को लेकर पाकिस्तान के प्रोपेगेंडा के भय को प्राथमिकता दी और ऐसा प्रदर्शित किया कि हिंदू धार्मिक प्रतीक एक सांस्कृतिक अधिकार न होकर एक कूटनीतिक बाध्यता है।

उन्होंने इस समारोह को एक निजी मामले से आगे देखे जाने के प्रति आपत्ति जताई, इससे भारत सरकार को दूर रखा और यहां तक कि सौराष्ट्र सरकार की भी इस समारोह से जुड़ने या सार्वजनिक निधियों को व्यय करने पर आलोचना की। यह प्रदर्शित करता है कि हिंदू धार्मिक पुनरोत्थान के साथ सरकार के किसी भी जुड़ाव से वह हमेशा असहज रहे।

दिग्विजय सिंह जी (नवानगर के जाम साहब) को 24 अप्रैल, 1951 का पत्र
दिग्विजय सिंह को भेजे अपने पहले पत्र के दो दिनों के बाद लिखे इस पत्र में उन्होंने खुले रूप से सोमनाथ उद्घाटन पर “पुनरूत्थानवाद” कहकर हमला किया और चेतावनी दी कि राष्ट्रपति और मंत्रियों की सहभागिता के “राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रूप से दुष्परिणाम” होंगे। हिंदू सभ्यतागत जीर्णोद्धार के एक ऐतिहासिक कार्य के साथ खड़े होने के बजाय उन्होंने इसे खुद भारत के लिए ही एक खतरे के रूप में देखा।

महासचिव और विदेश मंत्रालय के विदेश सचिव को 17 अप्रैल 1951 का पत्र
इस पत्र में जवाहरलाल नेहरू ने निर्देश दिया था कि दूतावासों को सोमनाथ ट्रस्ट से पवित्र नदी जल के आग्रहों पर थोड़ा भी ध्यान न देने के बारे में सूचित किया जाना चाहिए। यह स्पष्ट रूप से हिंदू धार्मिक कार्यकलापों की सांकेतिक अभिव्यक्तियों के प्रति उनकी असहजता प्रदर्शित करती है। उन्होंने स्वीकार किया था कि उन्होंने पहले ही राष्ट्रपति और के. एम. मुंशी के प्रति अपनी अप्रसन्नता जाहिर की थी। दिनांक : 17 अप्रैल 1951मैंने श्री राजगोपालाचारी को 21 मार्च के पणिक्कर के पत्र की एक प्रति भेजी है। मैंने श्री मुंशी को भी सोमनाथ मंदिर के बारे में लिखा है। यह विलक्षण बात है कि हमारे दूतावासों को इस प्रकार संबोधित किया जाए और दूर की नदियों के जल और विभिन्न देशों की मिट्टी संग्रहित करने को कहा जाए। मैंने कुछ समय पहले राष्ट्रपति के समक्ष उल्लेख किया था कि मुझे इस अवसर पर उनका सोमनाथ मंदिर का दौरा करना उचित नहीं प्रतीत होता। उन्होंने कहा कि वह ऐसा करने का वादा कर चुके हैं और उनके लिए इस वादे से मुकरना कठिन है। इसके बारे में कुछ नहीं किया जा सकता। लेकिन मैंने राष्ट्रपति और श्री मुंशी दोनों को बता दिया था कि मैं इस प्रकार के कार्य-कलापों को पसंद नहीं करता। क्या विदेश मंत्रालय विभिन्न नदियों के जल की मांग करने वाले विदेशों में स्थित हमारे दूतावासों को संबोधित इन पत्रों के बारे में कुछ जानता है? मुझे लगता है आपको हमारे दूतावासों को पत्र लिखना चाहिए कि वे इन आग्रहों पर बिल्कुल भी ध्यान न दें…
एस. दत्त (विदेश सचिव) को 9 मई 1951 का पत्र
सोमनाथ के प्रतिष्ठापन से कुछ ही दिन पहले, जवाहरलाल नेहरू इस समारोह से भारत सरकार के किसी भी जुड़ाव पर अपनी साफ़ चिंता ज़ाहिर करते रहे। विदेश सचिव एस. दत्त को पत्र के माध्यम से उन्होंने सोमनाथ से सरकारी जुड़ाव पर आपत्ति जताई और उद्घाटन की पूर्व संध्या तक हिंदू सभ्यता के इस प्रतीक के जीर्णोद्धार में सरकार की भागीदारी को लेकर अपनी लगातार बेचैनी दिखाते हुए दोहराया कि ऐसा जुड़ाव “बहुत दुर्भाग्यपूर्ण” है।

पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त खुब चंद को 19 मार्च 1951 का पत्र
जवाहरलाल नेहरू ने औपचारिक रूप से सोमनाथ प्रतिष्ठापन के लिए सिंधु नदी के पानी के इस्तेमाल को नामंजूर कर दिया, विदेश सचिव के माध्यम से बताया कि इस अनुरोध को उनकी मंज़ूरी नहीं है, और आदेश दिया कि भविष्य में ऐसे किसी भी अनुरोध को पहले से मंज़ूरी दी जाए, जिससे भारत सरकार इस समारोह से प्रभावी ढंग से दूर हो गई और इसके प्रतीकात्मक महत्व को दबा दिया गया।
जवाहरलाल नेहरू ने एक ऐसी सलाह को मंज़ूरी दी और समर्थन किया जिसमें भारतीय अधिकारियों ने ज़ोर दिया था कि सोमनाथ के लिए सिंधु नदी का पानी भेजे जाने के बारे में “किसी भी परिस्थिति में कोई प्रचार नहीं होना चाहिए”। उन्होंने एक सभ्यतागत कार्य को खुले तौर पर स्वीकार करने के बजाय “पाकिस्तान में तीखी टिप्पणी” के डर को प्राथमिकता दी और इस तरह यह दिखाया कि सरकार ने शत्रुतापूर्ण प्रतिक्रियाओं के खिलाफ प्रतिष्ठापन का बचाव करने के बजाय चुप्पी और छिपाव को कैसे चुना।
राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को 2 मार्च 1951 का पत्र
जवाहरलाल नेहरू ने यह पत्र साफ़-साफ़ यह जताते हुए लिखा कि उन्हें राष्ट्रपति का सोमनाथ के उद्घाटन में शामिल होना “पसंद नहीं आया”। उन्होंने सलाह से आगे बढ़कर सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के पैमाने, प्रचार और प्रतीकवाद पर अपनी बेचैनी ज़ाहिर की और सुझाव दिया कि इसे टाल देना चाहिए था और यहां तक कि राष्ट्रपति से इसकी अध्यक्षता नहीं करने का आग्रह किया।

सी. राजगोपालाचारी (केंद्रीय गृह मंत्री) को 11 मार्च 1951 का पत्र
जवाहरलाल नेहरू ने सोमनाथ के उद्घाटन में राष्ट्रपति की सहभागिता का खुलकर विरोध किया और कहा कि वह “पसंद करते” कि राष्ट्रपति इससे न जुड़ें, जो एक बड़े हिंदू सभ्यतागत कार्यक्रम से राष्ट्राध्यक्ष को दूर रखने की एक सक्रिय कोशिश थी जिसे वह राजनीतिक रूप से असुविधाजनक मानते थे।

सी. राजगोपालाचारी (केंद्रीय गृह मंत्री) को 17 अप्रैल 1951 का पत्र
इस पत्र में, उन्होंने माना कि वह सोमनाथ मंदिर को लेकर “बहुत परेशान” थे।

कांग्रेसी मृदुला साराभाई को 24 अप्रैल 1951 का पत्र
जवाहरलाल नेहरू ने बार-बार पत्र लिखकर कहा कि सोमनाथ मंदिर का मुद्दा उन्हें “बहुत परेशान कर रहा है” और उन्होंने खुलकर हिंदू सभ्यता के इस प्रतीक के प्रतिष्ठापन से अपनी बेचैनी जाहिर की।

