बिहार विधान सभा के माननीय अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार दिनांक–19–01–2026 से 21–01–2026 तक उत्तर प्रदेश विधान सभा, लखनऊ में आयोजित 86 वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में शामिल हुए।
कार्यक्रम के दौरान आज दिनांक–21–01–2026 को आयोजित प्लेनरी सत्र में माननीय अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने “ जनता के प्रति विधायिका की जवाबदेही” विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि
यह विषय शासन की आत्मा से जुड़ा हुआ है। जनता के प्रति जवाबदेही से ही लोकतंत्र की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता सुदृढ़ होती है। लोकतंत्र में सत्ता का स्रोत जनता होती है और विधायिका जनता की इच्छा की प्रतिनिधि संस्था के रूप में उसके प्रति उत्तरदायी रहना अपना मूल दायित्व मानती है। इस जवाबदेही के तीन आधार हैं- पारदर्शिता, निगरानी और नागरिक सहभागिता।
विधायिका की जवाबदेही का पहला और सबसे महत्वपूर्ण आधार पारदर्शिता है। सदन की कार्यवाही, विधायी बहसें, प्रश्नोत्तर, समितियों का प्रतिवेदन और विधेयकों पर विचार- ये सभी प्रक्रियाएँ जितनी अधिक खुली और सुलभ होंगी, जनता का विश्वास उतना ही सुदृढ़ होगा। आज प्रौद्योगिकी के माध्यम से कार्यवाही का सीधा प्रसारण, डिजिटल अभिलेख और सार्वजनिक पोर्टलों पर सूचनाओं की उपलब्धता ने विधायिका और नागरिकों के बीच की दूरी को कम किया है।
जवाबदेही का दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु है- निगरानी और नियंत्रण। विधायिका का दायित्व है कि वह कार्यपालिका की नीतियों, व्यय और प्रशासनिक निर्णयों की प्रभावी समीक्षा करे। हमारी प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमावली में लोक महत्व के विषय उठाने और सरकार को स्थिति स्पष्ट करने के लिए बाध्य करने के कई उपकरण निर्धारित हैं। प्रश्नकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव और समितियों की भूमिका इसी उद्देश्य की पूर्ति करती हैं। जब ये उपकरण सक्रिय और सार्थक ढंग से प्रयुक्त होते हैं, तब शासन अधिक उत्तरदायी और संवेदनशील बनता है। समितियों के सुझाव न केवल प्रशासनिक सुधार को बढ़ावा देती है, बल्कि जनता के हितों की रक्षा भी सुनिश्चित करती है।जवाबदेही विधायकों के व्यक्तिगत आचरण और नैतिक उत्तरदायित्व से भी जुड़ी है। सदस्यों का यह कर्तव्य है कि वे सदन में तथ्यपरक, मर्यादित और जनहित-केन्द्रित विमर्श करें।
तीसरा बिंदु यानी नागरिक सहभागिता भी जवाबदेही को मजबूत करने का एक प्रभावी माध्यम है। जन-संवाद और मीडिया के माध्यम से जनमत की अभिव्यक्ति- ये सभी विधायिका को जनता की अपेक्षाओं से जोड़ते हैं। जब नागरिक सक्रिय होते हैं और विधायिका संवाद के लिए तत्पर रहती है, तब लोकतंत्र जीवंत और सशक्त बनता है।
इसके अलावा डिजिटल तकनीकी और आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस ने अधिकार और जवाबदेही दोनों को सहज बनाया है। इनसे सीखना भी होगा और इनके माध्यम से अपने दायित्व का निर्वहन भी करना होगा।
मैं यह कहना चाहूँगा कि जनता के प्रति जवाबदेही कोई औपचारिक दायित्व नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता का मूल तत्व है। विधायिका जितनी अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी और संवेदनशील होगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा। बिहार विधान सभा इस मूल भावना के साथ निरंतर कार्यरत है और भविष्य में भी जनता के विश्वास को सुदृढ़ करने हेतु प्रतिबद्ध रहेगी।
अंत में, मैं गीता के उपदेश से विधायी जवाबदेही को रेखांकित करना चाहता हूं :
“नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः”
यानी, नियत कर्तव्य का पालन करो क्योंकि कर्तव्य से विमुख होना कर्म करने से हीन है।
