इस स्टडी में नासा की ऑर्बिटिंग कार्बन ऑब्जर्वेटरी-2 (OCO-2) अंतरिक्ष यान और जमीनी ऑब्जर्वेशन से मिले डेटा का इस्तेमाल किया गया। रिसर्चर्स ने साल 2015 से 2020 तक कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन को ट्रैक किया। ध्यान देने वाली है कि OCO-2 मिशन का मकसद तमाम देशों के कार्बन उत्सर्जन का अनुमान लगाना नहीं था।
नासा की अर्थ साइंस डिविजन के डायरेक्टर करेन सेंट जर्मेन ने कहा कि यह एक उदाहरण है कि नासा कैसे कार्बन उत्सर्जन को मापने के प्रयासों को डेवलप कर रही है। स्टडी से जुड़े लेखकों को कहना है कि यह अध्ययन तमाम देशों के लिए फायदेमंद हो सकता है। कई ऐसे देश जिन्होंने पिछले कई वर्षों से अपना कार्बन उत्सर्जन रिकॉर्ड नहीं किया है, उनका डेटा भी इस स्टडी में जुटाया गया है।
स्टडी में पता चला है कि सिर्फ पेड़ों की कटाई से लैटिन अमेरिका, एशिया, अफ्रीका और ओशियाना के इलाकों में कार्बन उत्सर्जन बढ़ा है। यह स्टडी बताती है कि कार्बन उत्सर्जन को किस तरह से कम किया जा सकता है। ऐसे जंगल, जहां इंसानी दखल कम है, उनकी मदद से कार्बन उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है। रिसर्चर्स का कहना है कि उनके इस पायलट एक्सपेरिमेंट को भविष्य में और बेहतर किया जा सकता है, जिससे यह पता चलेगा कि दुनियाभर के देशों में कार्बन उत्सर्जन किस तरह से बदल रहा है।
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