कुर्सियां बदलती हैं, लेकिन क्या सत्ता का खेल बदलता है? पुस्तक के जरिए कॉरपोरेट संस्कृति के भीतर के समीकरणों पर उठाए गंभीर सवाल
पटना। कॉरपोरेट दुनिया बाहर से अवसर, सफलता और तरक्की की दुनिया दिखाई देती है, लेकिन इसके भीतर काम करने वाले लोगों के अनुभव कई बार इस चमकदार तस्वीर से बिल्कुल अलग होते हैं। मेहनत और काबिलियत के साथ-साथ पद, प्रभाव, रिश्ते और सत्ता के अनौपचारिक समीकरण भी पेशेवर जीवन को प्रभावित करते हैं। लेखिका अलका मिश्रा ‘मिंकी’ ने अपनी पुस्तक ‘कॉरपोरेट दरबार’ के माध्यम से कॉरपोरेट संस्कृति के इसी अनकहे पक्ष को साहित्य के जरिए सामने लाने का प्रयास किया है।
‘कॉरपोरेट दरबार’ नाम अपने आप में एक व्यंग्यात्मक संकेत देता है। तकनीक बदल गई, दफ्तरों का स्वरूप बदल गया और काम करने के तरीके भी बदल गए, लेकिन क्या सत्ता की मानसिकता पूरी तरह बदल पाई है? पुस्तक इसी मूल सवाल के इर्द-गिर्द पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करती है।
कुर्सियां बदलती हैं, दरबार नहीं?
किसी भी कॉरपोरेट संस्थान में पद और अधिकार को सफलता का पैमाना माना जाता है, लेकिन संस्थान के भीतर बनने वाले अनौपचारिक समीकरण कई बार औपचारिक व्यवस्था से अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं।
कौन निर्णय लेने वाले व्यक्ति के करीब है? किसकी बात बैठक में तुरंत सुनी जाती है? किसकी गलती आसानी से नजरअंदाज हो जाती है और किसकी छोटी-सी चूक भी बड़ी समस्या बन जाती है? ये ऐसे सवाल हैं, जिनकी चर्चा भले ही हर कार्यालय में खुले तौर पर न होती हो, लेकिन पेशेवर जीवन में अनेक लोग इनका अनुभव करते हैं।
अलका मिश्रा ‘मिंकी’ ने इन्हीं अनुभवों और सवालों को साहित्यिक स्वर देने की कोशिश की है।
सफलता के पीछे छिपे इंसान की कहानी
‘कॉरपोरेट दरबार’ का केंद्र केवल बॉस, कर्मचारी, प्रमोशन या ऑफिस की राजनीति नहीं है। पुस्तक उस व्यक्ति की मनःस्थिति को भी सामने लाती है, जो हर दिन अपने काम के साथ-साथ अपनी पहचान और योग्यता साबित करने की कोशिश करता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि व्यक्ति कब चुप रहे, कब अपनी बात रखे, कहां समझौता करे और किन परिस्थितियों में अपने सिद्धांतों पर कायम रहे।
आज नौकरी महज आय का साधन नहीं रह गई है। यह व्यक्ति की पहचान, आत्मविश्वास, सामाजिक स्थिति और जीवनशैली से भी गहराई से जुड़ी है। ऐसे में कार्यस्थल की संस्कृति और वहां मौजूद सत्ता-समीकरणों का प्रभाव भी व्यक्ति के जीवन पर व्यापक रूप से पड़ता है।
असहज सवाल पूछना लेखन की खासियत
अलका मिश्रा ‘मिंकी’ का लेखन पाठक को सीधे निष्कर्ष देने के बजाय उसे स्वयं सोचने के लिए प्रेरित करता है। पुस्तक का एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि किसी व्यवस्था में आगे बढ़ने के लिए प्रतिभा के साथ-साथ सत्ता के समीकरणों को समझना भी जरूरी हो जाए, तो क्या उसे पूरी तरह मेरिट आधारित व्यवस्था कहा जा सकता है?
यह सवाल सिर्फ कॉरपोरेट कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। यह उस कार्य-संस्कृति से जुड़ा प्रश्न है, जिसका हिस्सा आज बड़ी संख्या में लोग हैं।
लेखिका के अनुसार, “हर चमकती कुर्सी के पीछे एक कहानी होती है और हर दरबार में कुछ अनकही आवाजें होती हैं।” ‘कॉरपोरेट दरबार’ उन्हीं आवाजों को सुनने और उन्हें शब्द देने का प्रयास है।
किताब आईना भी है और सवाल भी
‘कॉरपोरेट दरबार’ को केवल कॉरपोरेट दुनिया की कहानी के रूप में देखना इसके दायरे को सीमित करना होगा। यह पुस्तक पाठक को अपनी भूमिका और कार्य-संस्कृति के बारे में भी सोचने के लिए प्रेरित करती है।
क्या हम व्यवस्था को बदलते हैं या धीरे-धीरे उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं? क्या हम अपनी योग्यता के दम पर आगे बढ़ते हैं या सिस्टम के नियमों को समझकर? और क्या आधुनिक कार्यालय वास्तव में पुराने दरबारों से अलग हैं, या सिर्फ दरबार की भाषा, पोशाक और तौर-तरीके बदल गए हैं?
अलका मिश्रा ‘मिंकी’ की ‘कॉरपोरेट दरबार’ इन्हीं सवालों को पाठक के सामने रखती है। पुस्तक की सार्थकता इस बात में भी है कि इसके साथ कहानी खत्म नहीं होती, बल्कि पाठक के भीतर कार्यस्थल, योग्यता, सत्ता और पेशेवर रिश्तों को लेकर एक नई बहस शुरू हो जाती है।
