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जयंती पर आयोजित हुई लघु-कथा गोष्ठी, युवा लेखका शीतल श्रीवास्तव की दो पुस्तकों का हुआ लोकार्पण

पटना। अद्भुत ज्ञान-पिपासु और सदा अतृप्त जिज्ञासु थे महापंडित राहुल सांकृत्यान। जगत और जगदीश को जानने की उनकी अकुलाहट बहुत भारी थी। वे संसार के सभी निगूढ़ रहस्यों को शीघ्र जान लेना चाहते थे। यही अकुंठ जिज्ञासा उन्हें जीवन-पर्यन्त बेचैन और विचलित किए रही, जिससे वे कभी, कहीं भी स्थिर नहीं रह सके। दौड़ते-भागते रहे। किंतु इसी बेचैनी ने उन्हें संसार का सबसे बड़ा यायावर साहित्यकार, चिंतक और महापंडित बना दिया। जब पर्यटन और देशाटन का कोई भी सुलभ साधन नहीं था, उस काल में भी उन्होंने संपूर्ण भारत वर्ष की हीं नहीं, तिब्बत, चीन, श्रीलंका और रूस तक की लम्बी यात्राएँ की। जहाँ गए वहाँ की भाषा सीखी, इतिहास और साहित्य का गहन अध्ययन किया और संसार के सभी धर्मों का सार-तत्त्व लेकर अपने विपुल साहित्य के माध्यम से संसार को लाभान्वित किया। वे विश्व की 36 भाषाओं के पंडित और प्रयोगता थे। हिन्दी का संसार उन्हें यात्रा-साहित्य का पितामह मानता है। खच्चरों पर लाद कर उन्होंने तिब्बत से अनेक दुर्लभ पांडुलिपियाँ वापस कर भारत को दी, जो आज भी पटना के संग्रहालय में उपलब्ध है।
शनिवार को हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती, लघुकथा गोष्ठी और पुस्तक-लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने इसी के साथ कहा कि उनकी विद्वता और मेधा अद्भुत थी, जिनसे प्रभावित होकर काशी के पंडितों ने उन्हें महापंडित की उपाधि दी। वे बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के भी अध्यक्ष रहे, जिसपर सम्मेलन को सदा गौरव रहेगा। इस अवसर पर युवा लेखिका शीतल प्रसाद की दो पुस्तकें कैसे लिखूँ मैं अपनी प्रेम कहानी तथा चुनौतियाँ जीवन का दूसरा नाम का लोकार्पण भी किया गया। डा सुलभ ने पुस्तक के संबंध में कहा कि लेखिका एक भाव संपन्न प्रतिभाशाली उपन्यासकार हैं। अनुभव और अध्ययन के साथ इनका कला-पक्ष भी परिष्कृत होगा, ऐसा विश्वास करने का मन करता है।
समारोह का उद्घाटन करते हुए, पूर्व केंद्रीय मंत्री और सुख्यात चिकित्सक डा सी पी ठाकुर ने कहा कि सम्मेलन ने अपने आयोजनों से बहुत प्रसिद्धि पायी है। युवा साहित्यकारों का प्रोत्साहन बड़ी बात है, जो सम्मेलन लगातार करती रही है। सम्मेलन को फिर से अपनी पत्रिका का नियमित प्रकाशन करना चाहिए। सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेंद्रनाथ गुप्त, डा मधु वर्मा, डा अर्चना त्रिपाठी, लेखिका शीतल प्रसाद, रमेश कँवल, बच्चा ठाकुर, बाँके बिहारी साव, चंदा मिश्र तथा डा विनय कुमार विष्णुपुरी ने भी अपने विचार रखे।
लघुकथा-गोष्ठी में डा शंकर प्रसाद, डा मेहता नगेंद्र सिंह, डा विभा रानी श्रीवास्तव, डा ध्रुव कुमार ललक, रामनाथ राजेश, रौली कुमारी, डा आर प्रवेश, ई अशोक कुमार, डा पूनम सिन्हा श्रेयसी, श्याम बिहारी प्रभाकर, डा कुंदन लोहानी, डा अर्जुन प्रसाद सिंह, सिद्धेश्वर तथा संगीता गोविल ने अपनी लघुकथा का पाठ किया। मंच संचालन ओम् प्रकाश पाण्डेय तथा धन्यवाद-ज्ञापन प्रबंधमंत्री कृष्णरंजन सिंह ने किया।

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