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आखिर नस्सिम निकोलस तालेब की किताब, “स्किन इन द गेम” पढ़कर क्या सीखा जा सकता है? इससे कम से कम सात जरूरी बातें तो सीखी ही जा सकती हैं। उनकी ये किताब निवेश पर लिखी गयी है और निवेश, चाहे वो किसी भी चीज में हो, अनिश्चित होता है। अक्सर ये सलाह दी जाती है कि ऐसे मामलों में दूसरे अनुभवी लोगों की, इस विषय के विशेषज्ञों की सलाह ले ली जाए। ये आपको पता ही है कि निवेश केवल धन का नहीं होता, पैसे हमेशा निवेश नहीं किये जाते। रिश्तों के मामले में आप अपने समय का निवेश करते हैं। राजनैतिक विचारधारा जैसे मामलों में आप अपने भविष्य का निवेश करते हैं। “स्किन इन द गेम” भी हमें सिर्फ पैसे के निवेश की नहीं समय और भविष्य के निवेश के बारे में भी कम से काम सात बातें सिखा देती है।

 

तो सबसे पहले आपको ये समझ में आएगा कि आप अपने तर्कों से किसी को सच्चाई नहीं समझा सकते। सुनने वाला सुन लेगा, हो सकता है कि आपके तर्क अच्छे हों, तो वो चुप लगा जाए, आपकी बात मान ली है ऐसा दर्शाए। मानेगा वो तब जब उसका जमीनी सच्चाई से सामना हो। ये काफी कुछ वैसा ही है जैसे किसी को कश्मीर के बारे में पता हो, तो भी वो ये नहीं मानता कि आर्थिक रूप से ठीक-ठाक स्थिति में होना काफी नहीं है। ऐसा हो सकता है कि इलाका ही छोड़ना पड़े, आप अपने ही देश में शरणार्थी हो जाएँ। ये बात उसे तब समझ में आएगी, जब उसके ही इलाके में रामनवमी के जुलूसों पर पत्थर बरसने लगें। ये पुस्तक सबसे पहली बात ये सिखाती है कि सच्चाई को इस बात से कोई लेना देना नहीं होता कि तर्कों में कौन जीता था, रीअलिटी को सिर्फ सर्वाइवल से मतलब होता है।

दूसरी बात आप ये सीखते हैं कि शब्दों के चक्कर में पड़ने से आप कम समझते हैं, करने से आप ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं। सभ्यताओं का भविष्य इस बात पर निर्भर नहीं करता कि किस सभ्यता ने अपनी बातें दूसरी सभ्यता को समझा दीं। सभ्यताओं का भविष्य इस बात पर निर्भर है कि अंत में कौन सी सभ्यता बची हुई थी। इसका सबसे अच्छा उदाहरण अभी हाल का तालिबान है। कभी वर्षों पहले तक सामना रेंज के नाम से विख्यात एक लड़ाई में एक जगह हासिल की गयी थी। फिर बाद में लोगों को पता नहीं कैसे “समझा लेने” की गलतफहमी हो गयी। इसका नतीजा ये हुआ कि हमने देखा कि अमेरिकी सेनाएं हटते ही उनकी धार्मिक किताबें, जिनके जरिये शायद “समझाने की कोशिशें” की गयी होंगी, वो सर पर लिए लोग वापस भारत आ रहे थे। किस्मत की बात है कि भारत वो आखरी जगह है जहाँ ये लोग वापस आ सकते हैं। अगर कल को ये देश स्वयं ही युद्धग्रस्त, अशांत हो, तो ये लोग भागकर कहाँ जायेंगे पता नहीं। नहीं, गलतफहमी मत पालिए, अमेरिका-कैनेडा वगैरह अपनी मदद करने वाले अफगानियों को छोड़कर भागे थे। हवाई जहाज से गिरते लोग याद हैं न?

 

Kamlesh Tiwariतीसरी बात जो बड़ी जरूरी है, वो आप इस किताब से ये सीखते हैं कि जिनका अपना कुछ भी दाँव पर न लगा हो, ऐसे लोगों की सलाह नहीं सुननी चाहिए। किताब के नाम “स्किन इन द गेम” का मतलब ही यही है कि जिसका अपना भी अस्तित्व दांव पर लगा हो। अगर स्थिति ऐसी है कि आपके फायदे में आपको सलाह देने वाले का भी फायदा है, लेकिन नुकसान में सलाह देने वाला साफ़ बच जाता है, आप अकेले नुकसान झेलते हैं, तो आपको सावधान हो जाना चाहिए। इसका अच्छा उदाहरण स्वर्गीय कमलेश तिवारी हो सकते हैं। जिस संगठन के बचाव में वो उतरे थे, उसे तो उनके बोलने से और हत्या से भी, दोनों से फायदा होता है, लेकिन जो नुकसान झेलना पड़ा, वो कमलेश तिवारी जी को अकेले, या केवल उनके परिवार को हुआ। तो ऐसे किसी संगठन, या व्यक्ति के समर्थन में आप बोल रहे, काम कर रहे हैं, जो आपपर जानलेवा हमले की स्थिति में भी मुखर नहीं होती तो बेहतर होगा कि आप उन्हें याद दिलाएं कि ताली एक हाथ से कब तक बजेगी?

 

चौथी बात आप इस पुस्तक से ये सीख जायेंगे कि आपका उद्देश्य किसी तर्क वितर्क में जीत जाना नहीं है। आप किसी कॉलेज के डिबेट ग्रुप में मंच पर केवल भाषण देने के लिए नहीं खड़े। अच्छे तर्क देने पर आपको कोई मैडल, कोई पुरस्कार कोई सम्मान नहीं मिलने वाला। आपका उद्देश्य ये है कि आप जो बात कह रहे हैं उसके सही होने से आपकी विचारधारा के लोग सत्ता में आएंगे, या नीतियों के बारे में आपकी जो राय है, उससे कुछ उद्यमों-व्यापारों को फायदा-नुकसान होगा जो सीधा आपके उसी क्षेत्र में काम करने की वजह से, या शेयर मार्केट के जरिये उससे जुड़े होने के कारण आपके फायदे नुकसान से जुड़ा है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि मोदी के समर्थन-विरोध में तर्क देते समय आपका उद्देश्य स्वयं को राजनैतिक रूप से अधिक समझदार दिखाना नहीं होता। आपका उद्देश्य है कि वही सरकार सत्ता में आये ताकि वो नीतियां लागू हों, जो आपको चाहिए। ऐसे में ये भी सोचना होगा कि गाली-गलौच करने पर, महिलाओं से बहस करने पर, क्या अच्छी छवि बनेगी? ऐसा करने पर आपसे ज्यादा लोग जुड़ेंगे? सोचियेगा!

 

mcdonalds-1580721066अब पाँचवी बात पर चलते हैं। ये किताब बताती है कि औसत और अनिश्चित में से एक को चुनना हो तो लोग औसत को चुनते हैं, अनिश्चित को नहीं चुनते। इसका उदाहरण अक्सर मैकडॉनल्ड से दिया जाता है, जो कि औसत किस्म के बर्गर बनाता है। इसकी तुलना में कोई स्थानीय भोजन बनाने वाले रेस्तरां भी वहीँ आस पास दिख सकते हैं। ग्राहक को आमतौर पर पता होता है कि एक औसत बर्गर कैसा लगता है। इसकी तुलना में स्थानीय व्यंजन अगर बहुत अच्छे भी बने हों, तो उनका स्वाद बाहर से आये व्यक्ति को अच्छा लगेगा या नहीं, ये अनिश्चित होता है। इस वजह से अधिकांश बार आप पाएंगे कि अनिश्चित स्वाद वाले स्थानीय रेस्तरां के बदले लोग औसत स्वाद वाले मैकडॉनल्ड में चले जाते हैं। व्यापार की दृष्टि से देखा जाये तो ये मैकडॉनल्ड के लिए अच्छा है। इसे भारतीय राजनीति पर लागू करें तो एक “हिन्दू राष्ट्र” का स्वरुप, उसके कानून, उसमें व्यापार करना, ये अनिश्चित है। अभी जो व्यवस्था है, वो घटिया से औसत के बीच की कही जा सकती है। लोग अनिश्चित हिन्दू राष्ट्र चुनते हैं, या औसत मौजूदा व्यवस्था, ये आस पास पूछकर देख लीजिये!

 

छठी बात आप ये सीखते हैं कि लोग नुकसान से, घाटे से, बचना चाहते हैं। इस बात से उतना फर्क नहीं पड़ता कि उसके पास खोने को सचमुच कुछ है भी या नहीं है, लेकिन खोने का डर होता है। जितना ज्यादा आपके पास खोने के लिए होगा, उतना ही ज्यादा खोने का डर भी बढ़ेगा। इसका बड़ा आसान सा उदाहरण आप मजहबी आतंकियों के मामले में देख सकते हैं। आम आदमी के लिए जान जाने का डर होता है। आतंकी को लगता है कि आतंक फ़ैलाने के बदले जन्नत में उसे हूरें मिलेंगी। शराब की बहती हुई नदियाँ मिलेंगी। क्या अभी वो आतंकी शराब पीता हैं? नहीं, उसके लिए तो शराब मना है। क्या उसके पास अभी बहत्तर हूरें हैं? नहीं, उसके पास केवल एक अज्ञात भय है कि अगर वो अपने रास्ते पर नहीं रहा, तो उससे वो बहत्तर हूरें छिन जाएँगी जो अभी उसे मिली नहीं, भविष्य में कभी मिलेंगी या नहीं, पता नहीं! अज्ञात के खो जाने के भय से इतने लोग आतंकी बनने के रास्ते पर हैं, जाकर आईएसआईएस में शामिल हो रहे हैं। बीमा बेचने में, या हलाल सर्टिफिकेट बेचने में कंपनियां इसी खो जाने के डर का तो इस्तेमाल करती हैं।

 

सातवीं चीज जो “स्किन इन द गेम” सिखाती है वो ये है कि दुनियां के नियम कायदे, या समाज के निर्णय कोई लोकतान्त्रिक तरीके से सभी की सहमती से नहीं होते। असल में इसके लिए बहुमत भी नहीं चाहिये। उदाहरण के तौर पर हलाल सर्टिफिकेट को देखिये। दुनियां के अधिकांश लोगों को हलाल सर्टिफिकेट से फर्क नहीं पड़ता। भारत में अगर केएफसी और मैकडॉनल्ड या किसी भी एयरलाइन्स के ग्राहकों को देखें तो उनमें से कितने हलाल सर्टिफाइड मांगने वाले होंगे? लेकिन इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। शोर मचाने वाली माइनॉरिटी के कुछ मुट्ठी भर लोग, पूरे समुदाय पर अपना हलाल सर्टिफिकेट का नियम आराम से थोप देते हैं और मेजोरिटी, यानि बहुमत की बात कोई पूछता तक नहीं। आप मानते थे कि भारत में लोकतंत्र है, और बहुमत के हिसाब से बातें तय होती हैं। ऐसा ही सोचते थे न? तो ये सातवीं महत्वपूर्ण बात थी कि मुट्ठी भर लोग सभी के लिए नियम कानून तय करते हैं।

 

हो सकता है इतनी बातें सुनने के बाद आपको लग रहा हो कि ये पढ़ने लायक पुस्तक है। ये कोई बहुत मोटी किताब नहीं है, दो सौ पन्ने से भी कम की किताब है। इसके लेखक उन विषयों पर लिखने के लिए नहीं जाने जाते, जिस तरीके से हमने आपको इस किताब में लिखी बातें समझाई हैं। ये किताब मुख्यतः निवेश और अर्थशास्त्र से जुड़े मामलों को समझाने के उद्देश्य से लिखी गयी थी। इसके अलावा नस्सिम तालेब दो और महत्वपूर्ण पुस्तकों के लिय जाने जाते हैं। उनकी “द ब्लैक स्वान” और “एंटीफ्रेजाइल” भी काफी चर्चित रही है। जैसा कि आपको अंदाजा हो गया होगा, वो अर्थशास्त्र को वामपंथी चश्मे से नहीं देखते। इसकी वजह से कई हलकों में उनकी विचारधारा की आलोचना भी होती रही है। निवेश जैसे मुद्दों पर पढ़ते हों, या फिर उन नियमों को समझना हो जिनपर दुनियां काम करती है, तो नस्सिम तालेब की किताबें काम की हो सकती हैं।

By anandkumar

आनंद ने कंप्यूटर साइंस में डिग्री हासिल की है और मास्टर स्तर पर मार्केटिंग और मीडिया मैनेजमेंट की पढ़ाई की है। उन्होंने बाजार और सामाजिक अनुसंधान में एक दशक से अधिक समय तक काम किया। दोनों काम के दायित्वों के कारण और व्यक्तिगत हित के रूप में उन्होंने पूरे भारत में यात्रा की। वर्तमान में, वह भारत के 500+ जिलों में अपना टैली रखता है। पिछले कुछ वर्षों से, वह पटना, बिहार में स्थित है, और इन दिनों संस्कृत में स्नातक की पढ़ाई पूरी कर रहें है। एक सामग्री लेखक के रूप में, उनके पास OpIndia, IChowk, और कई अन्य वेबसाइटों और ब्लॉगों पर कई लेख हैं। भगवद् गीता पर उनकी पहली पुस्तक "गीतायन" अमेज़न पर लॉन्च होने के पांच दिनों के भीतर स्टॉक से बाहर हो गई।

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