train ka safar
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एक भाई को ट्रेन में बिना टिकट चढ़ने की आदत थी। कभी पकड़े नही गये इसलिये मन भी बढ़ता गया। अब वो किसी की भी सीट पर जाकर जबर्दस्ती बैठ भी जाते थे। टोकने पर हाथापाई पर उतर जाते थे।

ऐसे ही दिन दिन भाई का मन बढते गया। एक दिन एयर कंडीशन बोगी में चढ़ गये बिना टिकट। और जाकर एक सज्जन की सीट पर बैठ गये। सज्जन ने मना किया तो आदतन शुरु हो गये, पहले भला बुरा कहा, फिर धमकी देने लगे, उससे भी काम नही चला तो हाथापाई पर उतारु हो गये। उस सज्जन ने फोन कर पुलिस को बुला दिया।

पुलिस के सामने भी हेकड़ी बघार रहे थे तबतक टीटी भी आ गये। उन्होने आते के साथ सबसे पहले उनसे टिकट मांगा।
अब टिकट तो उनके पास था नही तो आँय बांय बकने लगे। टीटी ने फ़ाइन की बात की, पुलिस ने अरेस्ट करने की बात की तो कहने लगे, जब मै स्टेशन में घुसा तब आपलोग कहाँ थे?
जब मै ट्रेन में चढ़ा तब क्यों नही रोका? जब यहाँ आकर बैठा तब तो आपलोगों ने मना नही किया।
अब ये आदमी हमसे झगड़ा करने लगा तो आपलोग टिकट के बहाने इसकी तरफदारी में लग गये?
अब मेरे पास पैसा नही है और जाना इसी ट्रेन में है तो क्या आप हमको ट्रेन में से फेंक दिजियेगा?
कहाँ का न्याय है ये। हम वर्षों से बिना टिकट चल रहे थे तब आपको क्यों नही दिखा?
अब आप खाली इस आदमी का पक्ष लेने के लिये फ़ाइन लगाने लगे?
अब उसकी हिम्मत देख, दो चार बिना टिकट यात्री और आ गये उसके पक्ष में और पुरा हंगामा शुरु कर दिये। ये क्या तरीका है?
आपलोग तानाशाही कर रहे हैं!ये आदमी झगड़ा नही करता तो आप आते क्या? आप खाली इस आदमी के सपोर्ट में ये सब कर रहे हैं। घोर अन्याय है ये। गरीबों को तो कोई देखने वाला नही है! रेल गरीबों की दुश्मन है!

टीटी और पुलिस की समझ में नही आ रहा था कि बिना टिकट यात्री को फ़ाइन और अरेस्ट करने की बात करके उन्होने गलत किया या सही???

नोट – यह काल्पनिक कथा है,इसका किसी घटना से मिलना महज संयोग समझा जाएगा,लेखक का ऐसा कोई इरादा नहीं है।

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