Rajni Bala Brahmeshwar Mukhiya
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जो एक पक्ष के लिए आतंकी है, वो दूसरे पक्ष का क्रन्तिकारी भी हो सकता है! ये अजीब सा जुमला अंग्रेजीदां लिबटार्ड उछालते हुए मिल जाते होंगे। इसलिए आज हम उनका जुमला उन्हें ही याद दिला दें तो चौंकिएगा मत। ये जुमला हमें आज पहली बार याद आया हो ऐसा भी नहीं है। पिछले कई वर्षों से, जब भी कश्मीर सुनाई देता है, तब-तब हमें ब्रम्हेश्वर मुखिया और रणवीर सेना की याद आ जाती है। जैसे कश्मीर में वर्षों तक महबूबा मुफ्ती कहती रही “हमारे हैदरों को मत मारो”, बिलकुल वैसे ही (माना जाता है कि) बिहार में नक्सलियों पर कार्रवाई को बिहार के नेता रोकते थे। जैसे अब्दुल्ला खानदान आतंकियों को बचाता रहा, वैसा यहाँ भी होता ही था। यासीन मालिक जैसे हत्यारों को सिर्फ कश्मीर में युवाओं का आदर्श नहीं बनाया गया था, बिहार में भी संगठित अपराध की वामपंथी विचारधारा को प्रश्रय दिया जाता था।

 

बिहार का अभिशाप माने जाने वाले नेताओं जैसे लालू, वामपंथी आतंक पर चुप्पी साधने और उन्हें बढ़ावा देने के लिए “भूरा बाल साफ़ करो” जैसे नारे देने के लिए जाने जाते हैं। जिन मासूमों को “रालिव गालिव या चालीव” (धर्मपरिवर्तन करके हममें शामिल हो जाओ, मारे जाओ, या भाग जाओ) की ही तरह इस नारे का मतलब समझ में नहीं आता, उन्हें बता दें कि “भूरा बाल” का मतलब था “भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला” जिन्हें “साफ करने” यानि कत्ल करने की बात हो रही थी। उस दौर में भोजपुर के इलाके में रणवीर सेना का उदय हुआ। ये संगठन 1984 के आस पास अस्तित्व में आना शुरू हो चुका था। कृषि योग्य भूमि पर कब्जा करने के लिए उस दौर में (और कभी-कभार आज भी) ग्रामीण क्षेत्रों में अचानक 200-500 का नक्सली आतंकियों का समूह नजर आता। जमीनों पर लाल झंडा लगाकर उसे नक्सली भूमि घोषित कर दिया जाता और विरोध करने वाले को गोली मार दी जाती।

 

बिहार के पिछड़े ग्रामीण इलाकों में कोई किसान अपनी जमीन किन्हीं नक्सलियों से बचाता मारा भी गया तो कौन पूछता है? थाने-पुलिस की गलतफहमी मत पालिए। पुलिस थाने में कुल जमा 10-20 सिपाही होंगे, वो 200 नक्सलियों के झुण्ड से लड़ने नहीं, बाद में लाश का पंचनामा करने आते। नक्सली वामपंथी जमीन छीनने के लिए नहीं लड़ते का झूठ भी मत ही कहिये! जिस बेगुसराय को कभी बिहार का लेनिनग्राद-स्टालिनग्राद कहते थे, वहाँ से वामपंथी खत्म ही आपसी जमीन की लड़ाई में हुए थे, ये एक घोषित, कई किताबों (बिहार राजनीति का अपराधीकरण) में लिखा हुआ तथ्य है। शुरुआत में रक्षात्मक रहा ये संगठन थोड़े ही समय में प्रतिक्रिया देने से आगे बढ़कर स्वयं कार्रवाई करने पर आ गया। शुरुआत में रणवीर सेना के प्रमुख रंग बहादुर सिंह बने थे, लेकिन अब ये बदलकर स्व. श्री ब्रम्हेश्वर सिंह बन गए। तुम हमारे दो मारोगे तो हम भी तुम्हारे दस मारेंगे की नीति पर ये संगठन काम करने लगा।

 

भारत भर से कई मासूम-क्यूट लोग कभी-कभी पूछते हैं, हथियार होने से क्या होगा? असली मुद्दा तो लड़ने का दम, साहस है! साहस हो भी तो 200-400 की वामपंथियों की भीड़ से लड़के क्या उखाड़ लेते? अधिक से अधिक मारे ही जाते न? रणवीर सेना के पास अपने दौर के हिसाब से आधुनिक हथियार रहे। “हमारा वाला गुंडा किसी से रंगदारी न वसूले” जैसी किसी फर्जी नैतिकता के चक्कर में भी वो लोग पड़े हों, ऐसा याद नहीं आता। इस संगठन ने लालू का काफी नुकसान किया और लालू ने भी इसकी जांच के लिए अमीर दास कमीशन बिठाया था। रणवीर सेना का समर्थन कितना था, इसका अनुमान लगाना है तो बता दें कि 1998 में जनता दल के टिकट पर, आरा से लोकसभा चुनाव लड़ रहे चंद्रदेव प्रसाद वर्मा के चुनावी वादों में से एक वादा रणवीर सेना पर से प्रतिबन्ध हटाना भी था। रणवीर सेना पर बिहार सरकार ने जुलाई 1995 में प्रतिबन्ध लगा दिया था।

 

कुछ दिन बीते हैं, मई के अंत में कुलगाम के गोपालपुरा इलाके में रजनी बाला नाम की शिक्षिका को गोली मार दी गयी। ऐसा बताया जाता है कि ये कई वर्ष बाद घाटी में लौटी थीं। कश्मीरी पंडितों की हत्या पर रोज बवाल काटने वाले, अनुसूचित जाति से आने वाली रजनी बाला की हत्या पर मौन हैं। कथित “रासबादी” जमातों के लिए शायद उनकी हत्या पर कुछ कहना अपने पक्ष को कमजोर करना होता है, इसलिए वो चुप हैं। दल हित चिंतकों के लिए अनुसूचित जाति की शिक्षिका का इस्लामिस्ट हत्यारों द्वारा कत्ल, उनके जय भीम के साथ जय मीम जोड़ने के एजेंडा के खिलाफ है। रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की बात करो, मंदिर-मस्जिद की नहीं, कहने वाले इसलिए चुप हैं क्योंकि रजनी बाला के पास सरकारी नौकरी तो थी! अब समझ में आ रहा होता कि अस्तित्व में होना जरूरी है, नौकरी, शिक्षा, स्वास्थ्य सब बाद में आता है, इसलिये वो भी चुप हैं।

 

बाकी कुछ सूरमाओं के लिए किसी गायक की मौत महत्वपूर्ण है, कश्मीर में हो रही हत्याएं नहीं। अब समझ में आ तो रहा होगा कि क्यों रणवीर सेना की तरह कभी-कभी अपनी सुरक्षा अपने ही हाथ लेनी पड़ती है? क्यों ब्रह्मेश्वर मुखिया को समर्थन मिलता है? कश्मीर में क्या करना होगा, ये भी आपको पता ही है, आप बोलेंगे नहीं, किसी अदालत, किसी सरकार बहादुर, किसी पुलिस का इंतजार करेंगे, ये और बात है!

By anandkumar

आनंद ने कंप्यूटर साइंस में डिग्री हासिल की है और मास्टर स्तर पर मार्केटिंग और मीडिया मैनेजमेंट की पढ़ाई की है। उन्होंने बाजार और सामाजिक अनुसंधान में एक दशक से अधिक समय तक काम किया। दोनों काम के दायित्वों के कारण और व्यक्तिगत हित के रूप में उन्होंने पूरे भारत में यात्रा की। वर्तमान में, वह भारत के 500+ जिलों में अपना टैली रखता है। पिछले कुछ वर्षों से, वह पटना, बिहार में स्थित है, और इन दिनों संस्कृत में स्नातक की पढ़ाई पूरी कर रहें है। एक सामग्री लेखक के रूप में, उनके पास OpIndia, IChowk, और कई अन्य वेबसाइटों और ब्लॉगों पर कई लेख हैं। भगवद् गीता पर उनकी पहली पुस्तक "गीतायन" अमेज़न पर लॉन्च होने के पांच दिनों के भीतर स्टॉक से बाहर हो गई।

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