पटना, 11 अक्टूबर 2021: बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को कोविड-19 महामारी का काफ़ी प्रभाव पड़ा है। लिंग मानदंड लड़कियों और लड़कों दोनों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। साथ ही, अधिक असुरक्षित होने के कारण, लड़कियों को काम, शिक्षा और परिवार के साथ-साथ वैवाहिक हिंसा के जोखिम के बारे में प्रतिबंधात्मक रूढ़ियों का सामना करना पड़ सकता है, यूनिसेफ की फ्लैगशिप वैश्विक रिपोर्ट – ‘द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन 2021: ऑन माय माइंड: प्रोमोटिंग, प्रोटेक्टिंग एंड केयरिंग फ़ॉर चिल्ड्रेन्स मेंटल हेल्थ’ में ये चेतावनी दी गई है।
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस और अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस की पूर्व संध्या पर यूनिसेफ के वैश्विक रिपोर्ट को आज एक ऑनलाइन कार्यक्रम में सुश्री नफ़ीसा बिंते शफ़ीक़, राज्य प्रमुख, यूनिसेफ बिहार, बिहार सरकार के अधिकारीगण और किशोर-किशोरियों द्वारा जारी किया गया। संजय कुमार सिंह, कार्यकारी निदेशक, राज्य स्वास्थ्य सोसाइटी, बिहार सरकार, राज कुमार, निदेशक, समाज कल्याण विभाग, केशवेंद्र कुमार, अतिरिक्त कार्यकारी निदेशक, एसएचएसबी, डॉ. विजय प्रकाश राय, राज्य कार्यक्रम अधिकारी, बाल स्वास्थ्य, एसएचएसबी, डॉ. राजेश कुमार, प्रोफेसर एवं प्रमुख, मनोरोग विभाग, इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, पटना, शिवेंद्र पांडेय, कार्यक्रम प्रबंधक, यूनिसेफ बिहार, अभिलाषा झा, स्टेट रिसोर्स पर्सन, बिहार शिक्षा परियोजना परिषद और यूनिसेफ के वरिष्ठ अधिकारी रिलीज के दौरान बिहार मौजूद रहे।

एक विशेष सत्र में 4 किशोरों ने मानसिक स्वास्थ्य से निपटने के अपने व्यक्तिगत अनुभव किए साझा
अपनी पीड़ा के बारे में बताते हुए 15 वर्षीय प्रभा ने कहा कि मेरे पिता ने कभी मेरी इच्छाओं की परवाह नहीं की। वे मेरी शादी करना चाहता थे। मैंने ऐसा करने से इनकार कर दिया और अपनी पढ़ाई के लिए घर छोड़ दिया। मेरे जैसे छोटे गाँव की लड़की के लिए ऐसा निर्णय लेना बहुत कठिन था और मुझे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। लेकिन किलकारी बाल भवन के सहयोग से न केवल मैं अपने मानसिक समस्याओं से उबर पाई बल्कि आत्मनिर्भर भी हो सकी। माता-पिता को अपने बच्चों की बात सुननी चाहिए और उनकी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।
कोरोना पॉजिटिव होने के दौरान अपने तनावपूर्ण दिनों को याद करते हुए 17 वर्षीय सुदीक्षा ने कहा कि लंबे समय तक घर में रहने और मीडिया में कोविड-19 से होने वाली मौतों की ख़बरों ने मुझे बहुत विचलित कर दिया था। मैं योग करके और कुछ अच्छी फिल्में देखकर इस कठिन समय से निकल पाई। मैं चाहती हूँ कि मानसिक समस्याओं से जूझ रहे बच्चों के लिए मजबूत परामर्श तंत्र होना चाहिए।

18 साल की आरती ने मानसिक स्वास्थ्य को एक गंभीर मुद्दे के रूप में स्वीकार करने के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब मुझे कोविड की वजह से आइसोलेट रखा गया था तो मुझे काफी मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ा था। दवाओं और उचित देखभाल के साथ मुझे मानसिक सहारा भी मिला, जिससे मैं जल्दी ठीक हो पाई।
गया के बाल गृह में रहने वाले एक 16 वर्षीय किशोर ने जीवन में परिवार के महत्व के बारे में अपनी बातें रखीं। उसने कहा कि मुझे बाल गृह में सभी प्रकार की सहायता मिल रही है, लेकिन कोविड महामारी के दौरान मुझे अपने परिवार की बहुत याद किया।
राज्य भर के विभिन्न बाल गृहों में रहने वाली 4 लड़कियों ने भी शिक्षा, खेल की सुविधा और सरकार से अन्य सहायता जैसी अपनी मांगों को संक्षेप में रखा।
सुश्री नफीसा बिंते शफीक, राज्य प्रमुख, यूनिसेफ बिहार ने स्वास्थ्य बजट में मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवंटन बढ़ाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। वर्ष 2019 में इंडियन जर्नल ऑफ साइकेट्री की रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल स्वास्थ्य बजट का केवल 0.05 फीसदी मानसिक स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है। इस संदर्भ में लैंगिक असमानता को दूर करना भी काफी महत्वपूर्ण है। 2015-16 और 2018-19 में पापुलेशन काउंसिल द्वारा बिहार और उत्तर प्रदेश में 10-19 वर्ष आयु वर्ग के किशोरों के बीच किए गए अध्ययन “अंडरस्टैंडिंग द लाइवस ऑफ एडोलैसैंट्स एंड यंग एडल्ट्स (उदय)” के मुताबिक़ बिहार के 4,578 उत्तरदाताओं (1531 लड़के, 3047 लड़कियां) में से 25.6 फीसदी लड़कियों और 7.8 फीसदी लड़कों ने आत्मघाती व्यवहार की बात स्वीकारी। कम उम्र में शादी से लड़कियों की स्थिति और बदतर हो जाती है।
आगे उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित विश्वसनीय आंकड़ों का अभाव भी एक बड़ी चुनौती है। यूनिसेफ बच्चों और किशोरों के साथ-साथ देखभाल करने वालों के मानसिक स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के लिए बिहार सरकार और सभी हितधारकों के साथ काम करने के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही, निवेश, प्रोग्रामिंग और नीतियों में मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।

द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन 2021: ऑन माय माइंड: प्रोमोटिंग, प्रोटेक्टिंग एंड केयरिंग फ़ॉर चिल्ड्रेन्स मेंटल हेल्थ’ रिपोर्ट की मुख्य फाइंडिंग्स:
1. यूनिसेफ और गैलप द्वारा 2021 की पहली छमाही में 21 देशों में कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 14 से 24 वर्ष की आयु के लगभग 14 प्रतिशत बच्चे व युवा अक्सर मायूसी, उदासी और सामान्य गतिविधियों अरूचि महसूस करते हैं।
2. कोविड-19 महामारी से पहले भी भारत में पाँच करोड़ बच्चे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के शिकार थे। इनमें से 80-90 प्रतिशत बच्चों को किसी तरह की सहायता नहीं प्राप्त हुई (इंडियन जर्नल ऑफ सायक्रायट्री 2019)। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो 2018-19 के अनुसार, भारत में प्रत्येक एक घंटे में एक छात्र आत्महत्या करता है, जबकि प्रतिदिन 28 ऐसे ही छात्रों की आत्महत्या की सूचना प्राप्त होती है।
3. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य परेशानी की वजह से भारत में वर्ष 2012-2030 के अंतराल में 1.03 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की आर्थिक क्षति का अनुमान है।
4. बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा पर निवेश करने की व्यापक मांग के बावजूद इसके लिए निवेश नगण्य या न के बराबर है।
राज कुमार, निदेशक, समाज कल्याण विभाग, बिहार सरकार ने कहा कि हमने NIMHANS और यूनिसेफ़ के सहयोग से एक मनो-सामाजिक मॉड्यूल विकसित किया है। प्रत्येक बाल गृह में एक परामर्शदाता की नियुक्ति की गई है जिनको समय-समय पर क्षमता वर्धन प्रशिक्षण भी दिया जाता है। अब तक बाल गृह में रहने वाले 3,000 से अधिक बच्चों को मनो-सामाजिक सहायता प्रदान की गई है। हम स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग और यूनिसेफ की मदद से मानसिक स्वास्थ्य के प्रति बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान शुरू करने की योजना बना रहे हैं।
केशवेंद्र कुमार, अतिरिक्त कार्यकारी निदेशक, स्टेट हेल्थ सोसाइटी बिहार ने कोविड से अनाथ हुए बच्चों को हर संभव मानसिक सहायता देने की आवश्यकता को रेखांकित किया। बच्चों को रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करना बहुत मददगार हो सकता है। आयुष्मान भारत योजना के तहत स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम स्कूल स्तर पर बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों के समाधान हेतु एक महत्वपूर्ण पहल है।
आईजीआईएमएस के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ राजेश कुमार ने कहा कि बच्चे विभिन्न प्रकार के मानसिक समस्याओं का सामना करते हैं और चुपचाप झेलने को मजबूर होते हैं। किशोरों में अलग-अलग मनोरोग होते हैं जो ज्यादातर 14 साल की उम्र में शुरू होते हैं। चूँकि, बच्चे अपनी परेशानी कह नहीं पाते, इसलिए उनका इलाज बहुत मुश्किल हो जाता है और आम तौर पर इसमें देरी भी हो जाती है। कारगर इलाज के लिए माता-पिता, शिक्षकों और मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की ओर से अत्यधिक धैर्य की आवश्यकता है। और, मानसिक बीमारी को स्वीकार करना सबसे ज़रूरी है, न कि लापरवाही जो कि सामान्य प्रवृत्ति है।

बीईपीसी की अभिलाषा झा ने कहा कि 17 महीने की स्कूल बंदी और घर में कैद होने के कारण बच्चों में तनाव काफी बढ़ा है। शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा मनोदर्पण कार्यक्रम के तहत जारी किया गया टोल फ्री नंबर बच्चों के मानसिक मुद्दों को दूर करने में बहुत मददगार साबित हुआ है। हाल ही में, शिक्षा विभाग द्वारा स्कूलों में दो अनूठी पहल – हैप्पीनेस ज़ोन और लेट्स टॉक! की शुरुआत की गई हैं जिससे बच्चों को काफी मदद मिलेगी।
शिवेंद्र पांडेय, कार्यक्रम प्रबंधक, यूनिसेफ बिहार ने कहा कि बिहार में बच्चे महामारी से उत्पन्न जोखिमों और प्रतिबंधों की वजह से एक चुनौतीपूर्ण समय से गुजर रहे हैं।
वेबिनार का संचालन यूनिसेफ बिहार की संचार विशेषज्ञ निपुण गुप्ता ने किया। उन्होंने कहा हमें मानसिक स्वास्थ्य के बारे में खुल कर बात करने और इसके समुचित उपचार की जरूरत है ताकि बच्चों का जीवन बेहतर किया जा सके।
इस कार्यक्रम में मीडियाकर्मियों, छात्रों, सामजिक संगठनों और शिक्षाविदों सहित लगभग 200 लोगों ने भाग लिया।

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